होशियारपुर के प्रोफेसर की बड़ी खोज! 150 साल बाद हिमाचल के जंगलों में मिली दुर्लभ वनस्पति

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डीएवी कॉलेज होशियारपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार वर्मा ने कुल्लू के कसोल क्षेत्र में खोजी दुर्लभ प्रजाति, इंडियन फर्न जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

होशियारपुर (विक्की बेदी )

डीएवी कॉलेज, होशियारपुर के वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार वर्मा ने हिमाचल प्रदेश में लगभग 150 वर्षों बाद दुर्लभ हिमालयी वनस्पति ड्रायॉप्टेरिस कॉन्जुगाटा (Dryopteris conjugata) की पुनर्खोज कर वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। यह शोध पश्चिमी हिमालय की जैव विविधता के अध्ययन और संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। डॉ. वर्मा ने कुल्लू जिले के कसोल क्षेत्र के वनों में किए गए वनस्पति सर्वेक्षण के दौरान इस दुर्लभ प्रजाति को खोजा। इसके बाद प्रसिद्ध प्टेरिडोलॉजिस्ट डॉ. एस. पी. खुल्लर के सहयोग से इसकी वैज्ञानिक पहचान की पुष्टि की गई। इस शोध के निष्कर्ष इंडियन फर्न जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुए हैं। जानकारी के अनुसार, इस प्रजाति का हिमाचल प्रदेश से अंतिम प्रमाणित रिकॉर्ड वर्ष 1871 में शिमला पहाड़ियों से ब्रिटिश वनस्पति संग्राहक कर्नल चार्ल्स एलिसन बेट्स द्वारा दर्ज किया गया था। इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी तक राज्य से इसका कोई प्रमाणित वैज्ञानिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया। यह खोज हिमाचल प्रदेश से इस प्रजाति का दूसरा तथा कुल्लू जिले से पहला वैज्ञानिक रिकॉर्ड है। डॉ. सुनील कुमार वर्मा ने बताया कि पश्चिमी हिमालय विश्व के सबसे समृद्ध, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से अभी भी कम खोजे गए क्षेत्रों में शामिल है। उन्होंने कहा कि व्यवस्थित वनस्पति सर्वेक्षण और सूक्ष्म वर्गिकी (टैक्सोनॉमी) अध्ययन के माध्यम से आज भी अनेक दुर्लभ पौधों की खोज संभव है, जो वर्षों से वैज्ञानिक अभिलेखों में दर्ज नहीं हो सके हैं। यह उपलब्धि केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि पंजाब के लिए भी महत्वपूर्ण है। होशियारपुर और कंडी क्षेत्र शिवालिक पर्वतमाला का हिस्सा हैं, जहां समृद्ध प्राकृतिक वनस्पति पाई जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययन पंजाब के शिवालिक क्षेत्रों में भी दुर्लभ एवं कम प्रलेखित वनस्पतियों की खोज और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण को नई गति देंगे। यह उपलब्धि डीएवी कॉलेज, होशियारपुर और पंजाब के लिए गर्व का विषय है। साथ ही यह पश्चिमी हिमालय की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में हिमालय और शिवालिक के दूरस्थ वन क्षेत्रों में ऐसे और भी महत्वपूर्ण वनस्पति सर्वेक्षण नई वैज्ञानिक जानकारियां सामने ला सकते हैं।

Edited By: Rajinder Maddy

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