आस्था बनाम सरकारी प्रहारः श्री बाँके बिहारी मंदिर कॉरिडोर पर कोर्ट ने उठाए कड़े सवाल,  UP सरकार से मांगे जवाब 

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 नेशनल डेस्कः  उत्तर प्रदेश राज्य में मथुरा जिले के वृंदावन धाम के बिहारीपुरा में स्थित श्री बाँके बिहारी जी मंदिर  सिर्फ एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। कहा जाता है कि यह मंदिर करीब 00 साल पुराना  है और इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी  गोसाईं परिवारों के हाथों में पीढ़ियों से चली आ रही है।

 

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हाल के वर्षों में तीर्थयात्रियों की बढ़ती भीड़ और संकरी गलियों में लगने वाली भीषण भीड़भाड़ के कारण सुरक्षा, सुविधाओं और आपातकालीन व्यवस्थाओं को लेकर चिंता बढ़ी है। इसी के समाधान के तौर पर  उत्तर प्रदेश सरकार  ने  ‘बाँके बिहारी कॉरिडोर योजना’  का ऐलान किया जिसके तहत मंदिर परिसर के आसपास कई मकानों और दुकानों को हटाकर एक बड़ा कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव रखा गया ताकि भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की आवाजाही को आसान किया जा सके।
 

  👉   क्यों शुरू हुआ विवाद? 

मंदिर के सेवादार परिवारों और स्थानीय गोसाईं समाज  का प्रतिनिधित्व कर रहे मंदिर के मुख्य सेवायत  अनंत गोस्वामी हरिदास जी का कहना है कि यह कॉरिडोर योजना सिर्फ भीड़ प्रबंधन के नाम पर उनकी  सदियों पुरानी सेवा-पद्धति और प्रबंधन अधिकार को खत्म कर देगी।  अनंत गोस्वामी  व अन्य सेवादारों  व उनके परिवारों का दावा है कि सरकार ने बिना उचित संवाद और परामर्श के  अध्यादेश  लाकर मंदिर की स्वतंत्र व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की है। इससे पहले मथुरा प्रशासन ने कई मकानों और दुकानों को अधिग्रहित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया।  इसके विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक याचिकाएं दाखिल की गईं।
 

   👉  अब तक अदालत में क्या-क्या हुआ? 

 इलाहाबाद हाईकोर्ट:  हाईकोर्ट ने कहा था कि सरकार को श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए योजनाएं बनाने का अधिकार है लेकिन मंदिर की परंपरा और प्रबंधन अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। 


 सुप्रीम कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट में मंदिर ट्रस्ट और सेवादारों ने दलील दी कि बाँके बिहारी मंदिर कोई सरकारी मंदिर नहीं है  यह एक निजी ट्रस्ट और गोसाईं परिवारों द्वारा संचालित होता है।उन्होंने  सरकार के अध्यादेश को  संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ  बताया और कहा कि  कोर्ट ने पहले भी यूपी सरकार को कई दस्तावेज पेश करने और सभी पक्षों से संवाद करने का निर्देश दिया था।

 

  👉 मंदिर विवाद पर ताजा अपडेट

29 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? आज सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मामले की सुनवाई की और कई अहम टिप्पणियां कीं।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल: “राज्य सरकार किसी निजी धार्मिक स्थल के प्रबंधन में सीधे हस्तक्षेप कैसे कर सकती है? इसका क्या कानूनी आधार है?”

मंदिर ट्रस्ट का तर्क:  “सरकार ने अध्यादेश बिना परामर्श और बिना पूर्व नोटिस के लागू कर दिया। यह पूरी तरह अवैध है।”

कोर्ट ने पूछा  “अब तक राज्य सरकार ने कितने निजी मंदिरों को अपने अधीन लिया है? सभी का ब्योरा हलफनामे में दें।” 

 

  👉अगली सुनवाई  सुप्रीम कोर्ट का आदेश

 मामला अब  CJI (मुख्य न्यायाधीश) को भेज दिया गया है ताकि सभी लंबित याचिकाओं को जोड़कर एक साथ सुना जाए। अगली सुनवाई की तारीख CJI तय करेंगे। कोर्ट ने यूपी सरकार से कहा कि पूरे अध्यादेश की कॉपी,  कॉरिडोर योजना के सभी नक्शे, मंदिर से संबंधित सभी दस्तावेज और प्रशासनिक पत्राचार हलफनामे सहित 2 हफ्ते में कोर्ट में दाखिल किए जाए।
 
 👉  अब तक की स्थिति  

 अध्यादेश फिलहाल लागू है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
 मंदिर ट्रस्ट और सेवादार परिवार कॉरिडोर योजना को पूरी तरह रद्द करने की मांग  कर रहे हैं।
  यूपी सरकार का कहना है कि जन सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा  के लिए कॉरिडोर जरूरी है।
 स्थानीय लोग कह रहे हैं कि भीड़ प्रबंधन जरूरी है लेकिन परंपरा और निजी प्रबंधन से समझौता न हो। 

 

अब सबकी निगाहें CJI पर हैं कि वे किस बेंच को अगली सुनवाई सौंपते हैं और कौन सी तारीख तय होती है। माना जा रहा है कि अगस्त के पहले सप्ताह में इस मामले की नई तारीख आएगी। बाँके बिहारी मंदिर विवाद अब एक कानूनी और सांस्कृतिक प्रश्न बन चुका है । सवाल सिर्फ कॉरिडोर का नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा और सरकारी नियंत्रण  के बीच संतुलन का भी है।सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला इस ऐतिहासिक मंदिर के भविष्य को तय करेगा।

Edited By: Akriti Singh

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