धनखड़ के इस्तीफ़े से गूंजा सियासी गलियारा: मजबूरी थी या मनमुटाव?

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रिपोर्ट: विशेष संवाददाता

नई दिल्ली :
देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफ़े ने न केवल सियासी गलियारों में सनसनी फैला दी है, बल्कि सत्ता के केंद्र में हलचल भी मचा दी है। मंगलवार देर रात राष्ट्रपति को भेजे गए एक पत्र में उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की, जिसके पीछे "स्वास्थ्य कारणों" का हवाला दिया गया। लेकिन क्या मामला सिर्फ़ स्वास्थ्य तक सीमित है? या फिर पर्दे के पीछे कोई गहरी कहानी है?

राजनीति के चुपचाप विद्रोही?

धनखड़ का कार्यकाल भले ही विवादों से दूर रहा हो, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उन्होंने राज्यसभा में जिस तरह से कुछ संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित लेकिन सख्त रुख अपनाया, उससे उनके और सरकार के बीच बढ़ती दूरी के संकेत मिलते रहे। कई बार उनकी टिप्पणियां सत्ता पक्ष के लिए असहज रहीं — विशेषकर उन मौकों पर जब उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने की बात खुलकर कही।

एक वरिष्ठ भाजपा नेता के मुताबिक, "धनखड़ साहब संविधान को सर्वोपरि मानते थे। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह की राजनीतिक चालें चली जा रही थीं, वो उनके स्वभाव और विचारधारा से मेल नहीं खा रही थीं।"

मोदी सरकार के करीबी, फिर भी दूरी क्यों?

2017 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बनने से लेकर 2022 में उपराष्ट्रपति पद तक की यात्रा में धनखड़ को मोदी सरकार का भरोसेमंद माना जाता रहा है। उन्होंने कई बार विपक्ष पर तीखे वार किए, और भाजपा की वैचारिक लाइन से अलग नहीं दिखे। ऐसे में उनका इस्तीफ़ा चौंकाने वाला है।

सूत्रों की मानें तो संसद में गतिरोध, विधायिकाओं की कार्यप्रणाली, और न्यायपालिका के साथ रिश्तों को लेकर धनखड़ की राय पार्टी लाइन से कुछ अलग थी। खासकर हाल ही में जब उन्होंने एक सार्वजनिक मंच से ‘कार्यपालिका द्वारा संसद की मर्यादा को चुनौती’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया, तो भाजपा नेतृत्व भी असहज हो गया।

भविष्य की भूमिका या विराम?

इस्तीफ़े के तुरंत बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई कि क्या धनखड़ अब किसी राज्य की राजनीति में उतरेंगे? क्या भाजपा उन्हें कोई संगठनात्मक या प्रशासकीय जिम्मेदारी देने जा रही है? या फिर यह इस्तीफ़ा किसी अंतर्विरोध का परिणाम है?

विपक्ष ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि "धनखड़ ने यदि दबाव में इस्तीफ़ा दिया है, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।"

भाजपा की चुप्पी और विपक्ष की सक्रियता

भाजपा नेतृत्व अब तक इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साधे हुए है। प्रधानमंत्री कार्यालय या गृह मंत्रालय की ओर से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने इस इस्तीफ़े को 'संवैधानिक संकट की आहट' बताया है।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, "धनखड़ साहब का जाना बताता है कि सब कुछ सामान्य नहीं है। यह केवल स्वास्थ्य नहीं, व्यवस्था के भीतर की बेचैनी है।"

क्या कहता है इतिहास?

भारत के संवैधानिक इतिहास में उपराष्ट्रपति द्वारा कार्यकाल के बीच में इस्तीफ़ा देना अत्यंत दुर्लभ है। इससे पहले 1969 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन का निधन हुआ और उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने भी इस्तीफ़ा दिया, तब कार्यकारी राष्ट्रपति का पद खाली हो गया था। अब फिर वही स्थिति सामने है।

Edited By: Jagdeep

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