राजनीति में क्या अलग कर पाएगा ”स्वराज अभियान”?

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    2016 से कुछ साल पीछे जाते हैं तो अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल-आंदोलन के माध्यम से पूरे देश में एक बड़ी क्रांति आयी और उस क्रांति का सबसे बड़ा असर भी हुआ कि केंद्र में शासन करने वाली भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस रसातल में जा पहुंची और आज़ादी के बाद से ही किसी न किसी रूप में राजनीति करने वाली भाजपा (व संघ) पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हुए। यहाँ रूक कर थोड़ा सोचना होगा कि अन्ना आंदोलन के सबसे बड़े वादे ‘भ्रष्टाचार, काला धन, लोकपाल’ पर केंद्र सरकार ने क्या रूख अपनाया? ईमानदार आकलन के बाद हम देख पाते हैं कि ‘भ्रष्टाचार’ की ऊपरी परत पर प्रधानमंत्री का डर जरूर हावी है, किन्तु हर जगह भ्रष्टाचार रूक गया है, यह सोचना बचकाना ही होगा। इसकी रोक के लिए लोकपाल नहीं तो, लोकपाल-सदृश एक सिस्टम की जरूरत जरूर थी। जहाँ तक बात काले धन की है, तो यह एक ‘जुमला’ ही साबित हुआ और अगर हम ‘घोटालों’ की बात करें तो यह 5 साल के बाद ज्यादा पता चलता है। वैसे भी पिछली यूपीए सरकार के घोटाले उसके दूसरे कार्यकाल में ही सामने आये थे।

    कहा जा सकता है कि अन्ना आंदोलन के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण सत्ता में आने हेतु मदद पाने वाली भाजपा सरकार का परिणाम अभी मिला-जुला ही है। इस ‘अन्ना आंदोलन’ का दूसरा परिणाम आया अरविन्द केजरीवाल एंड टीम के उभार के रूप में, जिससे ‘आम आदमी पार्टी’ का गठन हुआ। इसमें अरविन्द केजरीवाल के साथ-साथ मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नाम शामिल थे। दिल्ली में इस पार्टी को जबरदस्त बहुमत भी मिला, किन्तु केजरीवाल के बढ़ते वर्चस्व के साये में अन्य पार्टियों की ही तरह उभरे मतभेद और महत्वकांक्षा की वजह से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को आम आदमी पार्टी से निकाल दिया गया। योगेंद्र यादव के लिए यह एक सदमे जैसी स्थिति थी, क्योंकि जो आम आदमी पार्टी सत्ता में आयी थी, उस पार्टी का ‘चाणक्य’ योगेंद्र यादव को एक सुर में माना गया। योगेंद्र यादव एक काबिल और मृदुभाषी व्यक्ति हैं और अपने उपनाम ‘चाणक्य’ के ही अनुरूप योगेंद्र ने प्रशांत भूषण और अन्य समाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर 14 अप्रैल, 2015 को स्वराज अभियान नाम का संगठन बनाया और धीरे-धीरे उसे देश के सैकड़ों जिलों तक फैलाया भी।

    आम आदमी पार्टी से निकाले जाने के बाद ‘स्वराज अभियान संगठन’ के लिए योगेंद्र ने ज़मीन पर खूब मेहनत भी की और अब एक नई राजनीतिक पार्टी की नींव रखने के लिए वह तैयार हो चुके हैं। योगेंद्र की व्यक्तिगत काबिलियत अपनी जगह है, किन्तु ऐसी स्थिति में सवाल उठना लाजमी है कि योगेंद्र यादव का स्वराज अभियान राजनीति में आखिर ‘नया’ क्या करेगा? जो शुरूआती बातें सामने आयी हैं, उसके अनुसार इस पार्टी का उद्देश्य भी आम आदमी पार्टी की तरह सच्चाई और ईमानदारी के साथ ‘आम आदमी’ की सेवा करना होगा। पिछली पार्टी में अरविन्द केजरीवाल के तानाशाही व्यवहार एवं कुछ हद तक अपनी महत्वाकांक्षा का शिकार हो चुके योगेंद्र यादव आखिर इस बात की गारंटी कैसे ले सकते हैं कि 2 अक्टूबर को गठित होने वाली नयी पार्टी में प्रशांत भूषण या खुद वह तानाशाही की स्थिति में नहीं होंगे?

    नई पार्टी के धरातल पर काम करने की जो बात अभी हो रही है, तो इसे एक बार राजनीतिक पार्टी बनने भर की ही देर है, उसके बाद उसे राजनीति के रंग में रंगने में भला कितनी देर लगेगी? अब तक यह बात कई-कई बार प्रमाणित हो चुकी है कि राजनीतिक पार्टी का गठन शुरुआत में सत्ता की भूख से ज्यादा कुछ नहीं है, पूछने वाले तो पूछेंगे ही कि यदि सच में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की जोड़ी सक्रिय तौर पर कुछ करना चाहती तो वह आम आदमी पार्टी में रह कर भी कर सकती थी और इसके साथ ही केजरीवाल पर भी दबाव रहता। अरविन्द केजरीवाल तानाशाह जरूर बन गए थे, किन्तु उन्हें वैसे करने की छूट तो पहले योगेंद्र और प्रशांत जैसे लोगों ने ही दी थी। आज योगेंद्र यादव कहते फिर रहे हैं कि राजनीतिक पार्टी बनने के बाद वह बड़बोलापन नहीं करेंगे, झूठ और नौटंकी नहीं करेंगे। उनका इशारा शायद अरविन्द केजरीवाल की दिल्ली में चल रही ‘नौटंकी’ पर रहा होगा, किन्तु अरविन्द की नौटंकी में भला उनका हिस्सा क्यों न माना जाए? जब अरविन्द आंदोलन के दौर से ही बाबा रामदेव और उनके बाद किरण बेदी जैसी हस्तियों को किनारे लगा रहे थे, तब तो योगेंद्र यादव का एक भी बोल नहीं फूटा।

    थोड़ा तार्किक ढंग से बात की जाये तो बेशक अरविन्द केजरीवाल ‘नौटंकी’ कर रहे हों, किन्तु अपनी पार्टी पर उनका नियंत्रण तो है। वह योगेंद्र यादव से तो बेहतर ही हैं, जिन्हें उन्हीं के द्वारा स्थापित पार्टी से बाहर कर दिया गया। यह राजनीतिक समझ और मजबूती की भी बात है। राजनीति में एक से एक गलत और सही लोग मिलते हैं, ऐसे में प्रश्न उठना लाजमी है कि जब अपने ही बनाये अरविन्द केजरीवाल पर वह नियंत्रण या तालमेल नहीं कर पाए तो आगे तो दुनिया बहुत बड़ी है। खैर, राजनीतिक दल बनाना सबका संवैधानिक अधिकार है और योगेंद्र यादव भी अपने इस अधिकार का प्रयोग कर रहे हैं तो कुछ गलत नहीं है, पर उनके जैसे विश्लेषक को समझना चाहिए कि ‘राजनीतिक पार्टियों’ के उभार का उचित समय क्या होता है। 2 अक्टूबर या 15 अगस्त को पार्टी का गठन करने से क्या जनता आप पर भरोसा कर लेगी?

    इस पार्टी में योगेंद्र यादव एक जाने-पहचाने चेहरे जरूर हैं, मगर उनकी पहचान और उनका फेस भी सीमित प्रभाव वाला ही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने राजनीतिक पार्टी बनाने में थोड़ी जल्दबाजी कर दी है। इतनी जल्दबाजी की, उनकी पार्टी की वेबसाइट ही अभी अधूरी दिखती है, तो फेसबुक पेज पर 25 हजार से भी कम लाइक हैं और ट्विटर पर मात्र 13 हजार फालोवर हैं, ऐसा नहीं है कि वेबसाइट, फेसबुक या ट्विटर से ही राजनीति होती है, किन्तु जब 2016 में आप एक पार्टी का गठन कर रहे हैं तो आपको पता होना चाहिए कि ‘इन्टरनेट और सोशल मीडिया’ का आज के समय में क्या महत्त्व है। वैसे भी, आम आदमी पार्टी के उभार के साथ-साथ 2014 के लोकसभा चुनाव में 150 से ज्यादा सीटों पर सोशल मीडिया का सीधा प्रभाव तमाम रिपोर्ट्स में सामने आ चुका है। यह एक तरह की लापरवाही अथवा जानकारी का अभाव भी दिखलाता है।

    सच कहा जाए तो योगेंद्र यादव को एक ‘शिक्षित व्यक्ति’ से आगे बढ़कर एक ‘राजनीतिक नेता’ होने के सफर को तय करना था, उसके बाद वह राजनीतिक दल की घोषणा करते तो कहीं ज्यादा बेहतर होता। अभी उन्हें ज़मीनी स्तर पर कार्य करना था, 2 साल, 4 साल या उससे आगे तक, जब तक लोगों के मन में केंद्र सरकार, अरविन्द केजरवील इत्यादि के प्रति फिर से गुस्सा नहीं भर जाता। आखिर, राजनीति में एक के खिलाफ लोगों के मन में क्रोध/ विरोध आएगा, तभी तो आप उसे रिप्लेस करने का प्रयत्न कर सकते हैं, लोगों को आंदोलित कर सकते हैं। इससे बड़ी जो एक खामी नज़र आ रही है, वह यह है कि योगेंद्र यादव के पास अभी कोई ‘ठोस मुद्दा’ भी नज़र नहीं आ रहा है, जिससे लोग कनेक्ट हो सकें। ऐसे में योगेंद्र यादव जैसे व्यक्ति का सामाजिक ‘स्वराज अभियान’ से इतनी जल्दी ‘राजनीतिक पार्टी’ बनाने का निर्णय व्यवहारिक प्रतीत नहीं होता है। बाकी, यह जनता है और अगर कोई विश्लेषक इसे पूर्ण रूपेण समझने का दावा करे तो यह उसकी नादानी ही कही जाएगी और इस आधार पर योगेंद्र एंड कंपनी अपनी टीम में ‘आशावाद’ का संचार तो कर ही सकती है, किन्तु यह आशावाद व्यवहारिकता में कैसे बदलेगा, यह देखना निश्चित तौर पर दिलचस्प रहने वाला है।

    (साभार)

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