आतंकी संगठन ही नहीं ‘आतंक के समर्थकों’ के खिलाफ भी कड़ाई जरूरी

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    दुनिया भर में आतंकवाद के बढ़ते हमलों के मद्देनजर आतंकी संगठनों के साथ ही ‘आतंक के समर्थकों’ के खिलाफ भी कड़ाई बरते जाने की आवश्यकता है। सऊदी अरब जैसे इस्लामिक राष्ट्र पूरी दुनिया में वहाबी-विचारधारा को पालने पोसने में रुचि लेते रहे हैं, जो अंततः आतंकवाद की ओर ही चली जाती है, किन्तु क्या मजाल जो अमेरिका खुलकर इसका विरोध कर सके। ऐसे में तो यही लगता है कि दुनिया में आतंकवादी और हमले करने वाले हैं, आतंकी हमलों की श्रृंखला बढ़ने ही वाली है। यदि सिर्फ 2016 में हुए आतंकवादी हमलों की ही बात करें तो जनवरी 2016 से लेकर जुलाई 2016 तक विश्व में 21 से ज्यादा बार हमला हुआ है, जिसमें लगभग 520 लोगों की मौत हुई है, जबकि हज़ारों की संख्या में लोग घायल हुए हैं तो इससे हुए ख़ौफ़ज़दा लोगों की संख्या तो पूछिए ही मत। इस साल 2 जनवरी को भारत के पठानकोट एयरबेस में हुए हमले से शुरू हुए वैश्विक आतंकवाद ने कई देशों में कहर बरपाया है। यह बात भी हमें समझनी होगी कि जब किसी देश पर आतंकी हमला होता है, तब वहां का प्रशासन और आम जनता इसको मिटाने के लिए बेचैन हो जाते हैं, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, फिर से सब कुछ सामान्य हो जाता है। इसके साथ पड़ोसी देश भी सहानुभूति जता कर अपने आप में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में नासूर बन चुके आतंकवाद का सामना करना बेहद मुश्किल दिखता है। भारत को इस मामले में तो खास सजगता बरतने की जरूरत है, क्योंकि जो बातें कुछ खबरों में आयी हैं, उसके अनुसार, बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुए हमले के बाद उसका सरगना भारत के पश्चिम बंगाल में छुपा बैठा है।

    यदि ऐसा है तो भारत सरकार के साथ पश्चिम-बंगाल सरकार को अपने संसाधन झोंक कर उसे पकड़ना चाहिए, ताकि दूसरे देशों के लिए एक नज़ीर बन कर दिखाया जा सके। ऐसे ही विश्व के अलग अलग देशों में हो रहे इस तरह के हमलों से बचने के लिए समूचे विश्व को एक साथ जमीनी स्तर पर काम करना होगा। हो सकता है कि कई देश इसमें शामिल न हों, क्योंकि वह खुद आतंकवाद को संरक्षण देते हैं, पर उनको पूरे विश्व के सामने अलग-थलग करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। इसके अतिरिक्त आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए सबसे जरूरी कदम आज की पीढ़ी की सोच को बदलना है। ज़ाकिर नाईक का मसला आज कल खूब उछल रहा है और इस बात में कोई शक नहीं है कि इस्लाम के प्रचार के नाम पर ऐसे लोग अंततः दूसरों के खिलाफ नफरत ही फैलाते हैं, तो मुस्लिम युवाओं के मन में आतंकवाद का बीज बोते हैं और उसका पोषण भी करते हैं। पूरे विश्व में ऐसे लोगों के खिलाफ प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। आज अमेरिका, चीन, भारत, जापान, रूस, ब्रिटेन इत्यादि सभी देश आर्थिक उदारीकरण के नाम पर हायतौबा मचाए रहते हैं, ओपन-इकॉनमी की बात करते हैं, ग्लोबल-विलेज की बात करते हैं, लेकिन ‘आतंकवाद के नाम पर एकजुट’ होने में इनमें अधिकांश को सांप क्यों सूंघ जाता है, यह समझ से बाहर है। ज़ाकिर नाईक ब्रिटेन में तो अपने उग्र और भड़काऊ भाषणों के कारण प्रतिबंधित है, किन्तु दूसरे देशों में क्यों नहीं? आखिर, वह अफ़्रीकी देशों में, सऊदी अरब में जिन बच्चों को आतंकवाद की राह पर धकेलेगा, क्या गारंटी है कि वह बच्चे बाद में आतंकवादी बनकर ब्रिटेन या अमेरिका पर हमला नहीं करेंगे? आतंकवाद के मामले में हमें यह समझना होगा कि जितने भी हमले हुए हैं, उनमें हमलावरों की उम्र 18 से 25 साल ही देखी गई है। अब प्रश्न है कि युवाओं की सोच को कौन दूषित कर रहा है?

    ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिसमें कई माँ-बाप को पता भी नहीं होता है कि उनका बच्चा कब ‘आतंकवादी’ बन गया! हालाँकि, उन्हें भी जागरूक रहना चाहिए किन्तु इंटरनेट की दुनिया में, ग्लोबलाइज़ेशन की दुनिया में एक सऊदी अरब में बैठा ज़ाकिर नाईक जैसा व्यक्ति भारत या बांग्लादेश के किसी बच्चे के मन में ज़हर भर सकता है। तो क्या, वैश्विक-स्तर पर आतंकियों के विचारों को रोकने के लिए ‘साझा-प्रयासों’ की आवश्यकता नहीं है? पूर्व में, संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन इसलिए ही तो हुआ था कि फिर ‘विश्व-युद्ध’ जैसी कोई विनाशक घटना न घटे, किन्तु आज ‘आतंकवाद’ क्या ‘विश्व-युद्ध’ से भी बड़ी समस्या नहीं बन चुका है? आप विश्व-युद्ध में हुआ जानमाल के नुक्सान का आंकड़ा और लगभग 1970 से शुरू हुए ‘वैश्विक आतंकवाद’ में हुए जानमाल के आंकड़े की तुलना करेंगे तो हैरान हो जाएंगे। ऐसे में आतंकवाद रोकने, उसके प्रचार-प्रसार को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी किसी वैश्विक-संस्था के निर्माण की जरूरत आन पड़ी है। ‘योग’ के नाम पर समूचे विश्व को एक झंडे के नीचे ला चुके हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मामले में भी ‘इनिशिएटिव’ लेना चाहिए और शुरू में 50 देश ही सही, मिलकर ‘एंटी टेररिज्म नेशन्स आर्गेनाईजेशन (ATNO)’ की स्थापना करें, जिसका मुख्यालय भारत में ही बनाया जाए, आखिर भारत से ज्यादा इसका पीड़ित और कौन रहा है?

    चूंकि समूचा विश्व आतंकवाद के मामले में कन्फ्यूज है और भारत के पास इस कन्फ्यूजन को दूर करने की पर्याप्त समझ पहले से ही है, जिसके कारण उसे इस संभावित संगठन की कमान अपने हाथ में लेनी चाहिए। वैसे भी तमाम ‘आर्थिक गतिविधियों’ के लिए कहीं यूरोपियन यूनियन, कहीं ब्रिक्स तो कहीं कुछ और बने ही हैं, तो आतंकवाद के खिलाफ क्यों नहीं ऐसा एक ‘वैश्विक-संगठन’ बने। इस संगठन के बैनर तले, विश्व के हर एक नागरिक को जागरूक किया जाए तो उसका योगदान भी लिया जाए। यह एक बेहतर प्रयास होगा, जो आने वाले समय में आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत कवच के रूप में कार्य करेगा।

    (साभार)

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