याहू के पतन की यह कहानी देती है कई सीख भी

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    इंटरनेट की दुनिया में याहू.कॉम का नाम भला कौन नहीं जानता है। जब गूगल, फेसबुक, ट्विटर, विकिपीडिया जैसे वर्ल्ड-क्लास वेबसाइटों का कोई नामलेवा भी नहीं था तब याहू.कॉम का ही सिक्का चलता था। आप यकीन करें न करें, किन्तु सच्चाई यही है कि गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियां याहू.कॉम के दरवाजे पर चक्कर लगा रहीं थीं कि याहू उन्हें खरीद ले, किन्तु यह गूगल, फेसबुक जैसी कंपनियों का सौभाग्य कहिये अथवा याहू.कॉम का दुर्भाग्य कि ऐसी डील किसी न किसी कारणवश नहीं हो सकी। गूगल और फेसबुक को खरीदने के अवसर के बाद याहू.कॉम के बिजनेस में जब गिरावट आने लगी, तब सबसे बड़े टेक-जायंट माइक्रोसॉफ्ट ने उसे खरीदने के लिए हाथ बढ़ाया, तकरीबन 44 अरब डॉलर में।

    याहू.कॉम प्रबंधन ने एक बार फिर स्थितियों का आकलन करने में बड़ी गड़बड़ी कर दी और आज नौबत यहाँ तक आ गयी कि याहू बिकी भी तो उसकी कीमत मात्र 4 अरब डॉलर ही लगी। जानकारी के मुताबि‍क, वेरिजॉन याहू का कोर इंटरनेट बि‍जनेस खरीद चुकी है, लेकिन इस डील में याहू के पेटेंट शामि‍ल नहीं हैं, जबकि इस डील में रि‍यल एस्‍टेट एसेट्स को शामि‍ल कि‍या गया है। याहू का कुल मार्केट कैप 3741 करोड़ डॉलर का बताया जाता है, जबकि याहू के कोर बिजनेस का मार्केट कैप करीब 24700 करोड़ रुपए का है। जिस कंपनी वेराइजन ने इसे ख़रीदा है, उसका मार्केट कैप 23 हजार करोड़ डॉलर बताया गया है। देखा जाए तो याहू के सफर का ऐसा हश्र शायद ही किसी ने सोचा हो। हालाँकि, 1995 में स्थापित याहू.कॉम ने तकरीबन 21 साल इस टेक्नोलॉजी की दुनिया में अपना नाम ज़िंदा रखा, यह भी कोई कम बड़ी बात नहीं है। याहू-मेल, याहू-सर्च, याहू-आंसर समेत सैकड़ों ऑनलाइन सर्विसेज को इस कंपनी ने लांच किया और उसे लोकप्रिय भी बनाया, पर यह समझना बेहद उलझन वाला तथ्य हो सकता है कि आखिर इतने बड़े ‘टेक-जायंट’ से गलती कहाँ हो गयी कि उसकी वैल्यू इतनी कम हो गयी। अभी कुछ ही दिन पहले प्रोफेशनल नेटवर्किंग कंपनी लिंकेडीन माइक्रोसॉफ्ट के हाथों बिकी और याहू की तुलना में इसका सीमित बिजनेस सेगमेंट होने के बावजूद इसकी कीमत तकरीबन 26 अरब डॉलर की लगी। याहू जितनी बड़ी कंपनी रही है, उसकी कहानी को चंद शब्दों में निपटाना इन्साफ नहीं होगा, इसलिए आइये इसके सफर पर एक व्यापक दृष्टि डालते हैं।

    शुरूआती सफर से बादशाहत एवं हार की कहानी: 1995 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दो छात्रों जेरी यैंग और डेविड फिलो ने याहू.कॉम की शुरुआत की थी। कहते हैं कि ‘याहू’ शब्द हिंदी फिल्मों से लिया गया था। खैर, याहू का ग्रोथ रेट इस बीच काफी ऊँचा रहा और कंपनी लगातार तरक्की करती चली गई। 1998 आते-आते याहू और इंटरनेट तो एक दूसरे के पर्याय से बन गए। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि तब तक इंटरनेट पर काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति याहू के बारे में जानता था और कहीं न कहीं उसकी सर्विसेज इस्तेमाल करता ही था। ठीक आज के गूगल की तरह! सुहाना सफर चलता जा रहा था कि याहू.कॉम को सबसे बड़ा झटका साल 2001 में लगा। तीन जनवरी 2000 को कंपनी का शेयर 118 डॉलर पर चल रहा था, लेकिन ग्लोबल-स्लोडाउन के बाद याहू के शेयर का भाव 26 सितंबर 2001 को करीब आठ डॉलर पर आ गया। शेयर बाजार की समझ रखने वाले व्यक्ति आसानी से समझ सकते हैं कि इतने बड़े फॉल डाउन के बाद कंपनियां गर्त में जाती ही हैं। याहू.कॉम की कमर भी यहाँ टूट गयी और इसकी बादशाहत को झटका लगते ही दूसरी तमाम कंपनियों ने इन्टरनेट पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी। हालाँकि, बावजूद इन सबके याहू संघर्ष करता रहा।

    गूगल-फेसबुक एवं माइक्रोसॉफ्ट एपिसोड: बेहद दिलचस्प बात है कि याहू को गूगल खरीदने का मौका एक नहीं दो-दो बार मिला था, लेकिन दोनों ही बार कंपनी ने ये मौका गंवा दिया। 1997 में वह 10 लाख डॉलर में गूगल को खरीद सकती थी, लेकिन उसने यह कहकर यह मौका ठुकरा दिया कि वह नहीं चाहती कि लोग याहू से कहीं और जाएं। उस समय तक गूगल सर्च-इंजिन के रूप में याहू के सामने एक बच्चा ही था, जो कुछ ही सेकंड में सर्च रिजल्ट्स देकर यूजर्स को उनके काम की वेबसाइट तक पहुंचाता था। फिर 2002 में भी याहू को अपनी ये गलती सुधारने का मौका दोबारा मिला, कीमत लगी 50 लाख डॉलर! पर तत्कालीन याहू के सीईओ टेरी सेमेल को गूगल की यह कीमत बहुत ज्यादा लगी थी और उन्होंने इस डील के लिए 30 लाख डॉलर का ऑफर ही दिया, जिससे यह डील नहीं हुई। सोचिये, आज गूगल का मार्केट कैप 522 अरब डॉलर है और अगर याहू-प्रबंधन ने तब इस सौदे की अहमियत समझी होती तो शायद उसकी बादशाहत और बड़ी हो जाती बजाय कि मिटने के! इसी तरह याहू को फेसबुक को खरीदने का मौका भी साल 2006 में मिला और याहू ने पिछली गलती से सीख लेते हुए फेसबुक के लिए एक अरब डॉलर की बोली भी लगाई थी। पर डील की सभी बातें तय हो जाने के बाद अपने शेयरों में आई गिरावट के कारण उसने बोली घटाकर 85 करोड़ डॉलर कर दी। ऐसे में फेसबुक-फाउंडर मार्क जकरबर्ग ने डील से मना कर दिया। आज फेसबुक का मार्केट कैप 250 अरब डॉलर है। जाहिर है, किस्मत ने याहू को बड़े मौके दिए पर उसके प्रबंधन ने ऐसे अवसरों को समझने में बड़ी भूलें कीं। इसी क्रम में आगे देखते हैं तो पाते हैं कि इन्टरनेट पर अब तक गूगल बादशाह के रूप में उभर चुका था और उसकी बड़ी चुनौती से निपटने के लिए माइक्रोसॉफ्ट ने याहू को 44 अरब डॉलर देकर साथ रखने की कोशिश की। हालाँकि, याहू के बोर्ड ने यह कहते हुए यह पेशकश ठुकरा दी थी कि कीमत काफी कम है। जाहिर है, याहू-प्रबंधन का यह फैसला भी गलत साबित हुआ और उसकी कीमत इस बीच घटती-घाटी 4 अरब डॉलर से भी कम हो गयी।

    पैसे का लालच, शोध नदारद: यूं तो बिजनेस का मतलब ही पैसे कमाना होता है, किन्तु इसके लिए आपको ग्राहकों को अपने साथ जोड़े रखना पड़ता है और ग्राहक तभी आपसे जुड़े रहते हैं जब आप रोज उन्हें कुछ नया देने का शोध करते रहते हो। आप गूगल या फेसबुक का उदाहरण ही ले लो। आपको उनकी कार्यशैली, शोध और परिणाम में पहले के मुकाबले सार्थक परिवर्तन नज़र आते ही रहेंगे, सुविधाओं में बढ़ोत्तरी दिखती ही रहेगी। याहू ने ‘पैसे कमाने का लालच तो किया, किन्तु उसके प्रोडक्ट्स में साफ़ दिख जाता है कि बदलते ज़माने के साथ उसके शोधकर्ता कदमताल करने में असफल रहे’। कई जगहों पर तो उसकी सर्विसेज में से शोध ‘नदारद’ ही दिखता है। गौर करने वाली बात है कि फेसबुक के सबसे बड़े सोशल नेटवर्क पोर्टल बनने से पहले फ्लिकर, ऑनलाइन फोटो शेयर करने वाला सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म था, जिसे याहू ने 2005 में खरीदा था। यह एक बेहतर डील थी और इसे खरीदने के बाद याहू इसे अपने सोशल नेटवर्क के रूप में विकसित कर सकती थी, क्योंकि लोग पहले से ही फ्लिकर पर तस्वीरें अपलोड करके उन्हें शेयर करते थे। पर पैसे की सोच भारी पड़ गयी और यूजर बेस बढ़ाने के बजाय याहू ने फ्लिकर को मॉनेटाइज करने की कोशिश की। यानी याहू ने तस्वीरों से पैसा कमाने की कोशिश की और यह स्‍ट्रैटजी बुरी तरह विफल रही। यहाँ तक कि 2010 में लांच हुयी इंस्टाग्राम सर्विसेज से भी कई मायनों में फ्लिकर पिछड़ गयी। फ्लिकर की ही तरह याहू की एक अन्य डील टंबलर.कॉम के साथ हुई। अगर आप टम्बलर.कॉम को नहीं जानते हैं तो बताते चलें कि अमिताभ बच्चन का ब्लॉग इसी प्लेटफॉर्म पर चलता है। इस सोशल नेटवर्क/ ब्लॉगिंग साइट को याहू ने 2013 में खरीदा था। याहू ने, टंबलर के मामले में भी फ्लिकर जैसी स्‍ट्रैटजी अपनाई। इसे खरीदने के फौरन बाद न सिर्फ इस पर विज्ञापनों की झड़ी लगा दी बल्कि टंबलर का डिजाइन भी बदल दिया। इससे धीरे-धीरे यूजर कम होते गए और जहाँ यह प्लेटफॉर्म गूगल के ब्लॉगर.कॉम और विश्व के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म वर्डप्रेस.कॉम से मुकाबला कर सकता था, वहीं इसे सीमित कर दिया गया।

    याहू की कुछ और बड़ी गलतियां: एक आम यूजर के नजरिये से अगर आप याहू.कॉम, गूगल.कॉम, फेसबुक.कॉम जैसी बड़ी वेबसाइट को विजिट करें तो आप समझ जायेंगे कि याहू के बिजनेस मॉडल में कहाँ कमी रह गयी। दर्जनों सर्विसेज को याहू ने मार्किट में लांच तो जरूर किया, किन्तु विशेषज्ञता में वह पीछे रह गयी। इसकी वेबसाइट पर आपको ‘सर्च-इंजिन’, ‘मेल-सर्विस’ के साथ-साथ वह सब कुछ दिखेगा जो किसी टिपिकल न्यूज वेबसाइट में दिखता है। 1995 में यह सही स्ट्रेटेजी रही होगी, किन्तु बाद में यूजर स्पेसिफाई होते गए। मतलब, सर्च वाले अलग, मेल वाले अलग, सोशल नेटवर्क वाले अलग! आप आज के यूजर को सब कुछ एक जगह देने की कोशिश करेंगे तो वह आप पर भड़क जायेगा। जरा कल्पना करें कि गूगल.कॉम के होम पेज पर गूगल सामान बेचने लगे तो क्या होगा? यह भी कल्पना करें कि 21वीं सदी के दूसरे दशक में अगर फेसबुक सोशल नेटवर्क के साथ-साथ मेल-सर्विस भी देने लगे तो क्या होगा? कहने और सोचने में यह बेशक आसान लगे, किन्तु यूजर के हिसाब से यह दुःखदायी अनुभव है, जो आपके समय को बर्बाद ही करेगा। याहू का सर्च-बिजनेस और उसकी मेल-सर्विस ही इतनी सक्षम थी कि वह गूगल को उभरने नहीं दे सकती थी, अगर उसमें गूगल जितना ही रिसर्च और यूजर की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता!

    तो यहाँ याहू की कहानी ‘आधी छोड़ सारी को धावे, सारी रहे न आधी पावे’ वाली हो गयी। हालात बिगड़ते चले गए और अंततः ‘याहू.कॉम’ जी अपना अस्तित्व बचा पाने में असफल रहे। हालाँकि, देखना दिलचस्प रहेगा कि ‘वेरिजॉन’ याहू के कोर बिजनेस का किस प्रकार कायाकल्प करती है, क्योंकि बेशक यह वेरिजॉन के पास है पर उसका मुकाबला तो उन्हीं पुराने खिलाड़ियों से है, जो याहू का बोरिया-बिस्तर बंधवा चुकी हैं।

    (साभार)

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