आशाजनक संदेश लाया है भारत का अफ्रीका जागरण

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    अफ्रीका के बारे में भारत का जागरण कुछ विलंब से हुआ है, हालांकि हमारे संबंध ईसा पूर्व से हैं। इथियोपिया के अधिकतर मंत्री भारतीय मूल के शिक्षकों द्वारा पढ़ाये गये हैं। वहां के राष्ट्रीय संग्रहालय में ईसा और इसलाम से पहले के भारतीय संबंधों का सम्मान से विवरण मिलता है- विशेषकर महिलाओं के गहनों के डिजाइन और वस्त्रों पर।

    दक्षिण अफ्रीका तो गांधी और मंडेला की स्मृति-गंध से सुवासित है- जहां के बारे में राजनयिक अकसर यह पुराना जुमला दोहराते हैं कि इस देश ने भारत के मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना कर वापस भेजा था यह सत्य भी है- पीटरमारिजबर्ग स्टेशन, जहां प्रधानमंत्री मोदी जी भी गये, यह वह स्थान है, जहां मोहनदास को अपमानित कर रेल के डिब्बे से बाहर फेंका गया था, जिसके बाद शुरू हुआ एक गांधी का महात्मा रूप। सत्याग्रह- रंगभेद और उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई। पीटरमेरिजबर्ग जाने का अवसर भी मिला था। अफ्रीकी नागरिक भारत के प्रति सद्भाव रखते हैं लेकिन उनको भी उसी प्रकार के व्यवहार की आशा है। भारत का अफ्रीका के प्रति अधिक सहयोग तथा उसके साथ आर्थिक सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयास देरी से ही सही लेकिन अत्यन्त महत्वपूर्ण है जिसके सार्थक परिणाम निकलेंगे।

    लेकिन, अफ्रीका सिर्फ सुखद स्मृतियों की सुगंध मात्र नहीं है। वहां अथाह गरीबी, आतंक, तानशाहियां, भीतरी विद्रोह और कबीलाई युद्धों का रक्तपात भी बिखरा हुआ है। पांच दिन में प्रधानमंत्री चार अफ्रीकी देश- मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया और केन्या गये। मोजाम्बिक में तो किसी भारतीय प्रधानमंत्री का 34 वर्षों बाद जाना हुआ है। एक साथ चार अफ्रीकी देशों की यात्रा पर जाने वाले भी वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। उनकी अफ्रीका यात्रा से पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी घाना, आयवरी कोस्ट और नामीबिया की यात्रा पर हाल ही में गये तथा उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी मोरक्को और ट्यूनीशिया की यात्रा पर गये थे। 26-29 अक्तूबर, 2015 को दिल्ली में हुए भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन में 54 में से 41 अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं के एकत्रीकरण ने दुनिया को चौंकाया था। यह मोदी सरकार की कूटनीतिक क्षेत्र में शानदार सफलता मानी गयी।
    आपसी आर्थिक संबंध-द्विपक्षीय व्यापार अभी बढ़ाने के अलावा भारत के अफ्रीका संबंध नवजागरण का एक बड़ा कारण चीन की अफ्रीकी देशों में गहरी पैठ है, असाधारण और अभूतपूर्व रूप से चीन का अफ्रीकी देशों में निवेश बढ़ा है, जो 2008 में सात अरब डॉलर से 2013 में 26 अरब डॉलर हुआ और गतवर्ष दिसंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने यह निवेश सत्तर अरब डॉलर तक ले जाने की घोषणा की। इसके बावजूद अफ्रीका में चीन की भरोसेमंद वह साख नहीं है, जो भारत की है।
    एक उपनिवेशवादी व्यापारी की तरह चीन भारी निवेश के बदले अफ्रीका के दुर्लभ खनिज, तेल, तांबा, जिंक ले जा रहा है और अफ्रीकी देशों में ढांचागत सुविधाओं के निर्माण हेतु भी चीन के इंजीनियरों और श्रमिकों का भारी तादाद में उपयोग कर रहा है।
    चीन-अफ्रीका व्यापार जहां 200 अरब डॉलर तक पहुंच रहा है। भारतीय निवेश अफ्रीकी देशों में 33 अरब डॉलर ही है। यह स्थिति भारत के लिए भविष्य में बहुत नुकसानदेह हो सकती है। केवल भावनात्मक बातें करने से बात नहीं बनती। महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, उपनिवेशवाद और नस्लभेद के खिलाफ आंदोलन में भारत की अफ्रीका समर्थक नीतियां प्रारंभिक वार्ता को सुखद जरूर बनाती हैं। लेकिन, उसके बाद अफ्रीकी देश पूछते हैं- हमारे आर्थिक विकास में आपका क्या योगदान है?
    अफ्रीकी देशों में भारतीय काफी सफल व्यापारी हैं, और वे अनेक पीढ़ियों से वहां बसे हैं पर उनकी जड़ें आज भी गुजरात या ब्रिटेन में हैं और उनका स्थानीय अश्वेत समुदाय के साथ वैसा आत्मीय मेल-जोल का संबंध नहीं है जैसा उनका ब्रिटिश या अमेरिकी समाज के साथ होता है। मोदी की अफ्रीका पर विशेष कूटनीति इन तमाम विसंगतियों एवं पूर्वकालीन उपेक्षाओं के नकारात्मक प्रभाव को बदलेगी और अफ्रीका में भारत के प्रति नया विश्वास जागायेगी। पूर्वी देशों से बड़ा अफ्रीकी विश्व है- 54 देश, एक अरब दस करोड़ की जनसंख्या, विश्व जनसंख्या का 14 प्रतिशत हिस्सा और विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था। दक्षिण अफ्रीका तो ब्रिक्स में भारत का साझीदार है।
    अफ्रीका से संबंध सुधारने के लिए भारत को अपने विश्वविद्यालयों में अफ्रीका-अध्ययन केंद्र, सुरक्षा संबंधों में वृद्धि, भारतीय इंजीनियरों और अध्यापकों की अफ्रीका निर्माण एवं शिक्षा संस्थानों में सहायता के कार्यक्रम बनाने होंगे। भारत के अनेक नगरों में अफ्रीकी नागरिकों के प्रति अधिक मेल-जोल और सद्भावना का वातावरण बनाना होगा। देर से ही सही, भारत का अफ्रीका जागरण भविष्य के लिए बहुत आशाजनक संदेश लाया है।

     

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