भारत-अमेरिकी सैन्य समझौतों ने उड़ाई चीन और पाक की नींद

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    भारत और अमेरिका के बीच हुए सैन्य सहयोग से संबंधित ऐतिहासिक समझौते ने चीन और पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका की सेना मरम्मत और सप्लाई को लेकर एक दूसरे के सैन्य ठिकानों और जमीन का इस्तेमाल कर सकेंगी। भारत और अमेरिका के रक्षा मंत्रियों ने इस बात पर मुहर लगाते हुए ‘लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम आॠफ एग्रीमेंट’ (एलईएमओए) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। चीन और पाकिस्तान की मीडिया ने इस समझौते को चिंताजनक बताते हुए इसे अपने लिए खतरा करार दिया है।

    बेहद खास है यह समझौता
    समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद अमेरिका ने अपने करीबी रक्षा सहयोगियों की भांति भारत के साथ भी रक्षा,व्यापार और तकनीक सांझा करने के पर सहमति जताई है। इसके साथ ही अमेरिका अपने करीबी सहयोगियों की तरह भारत के साथ भी रक्षा,व्यापार और तकनीक संबंधी सहयोग करने पर सहमत हो गया है । समझौते के तहत दोनों देशों के बीच सैन्य साजो सामान में सहयोग,आपूर्ति और सेवा जिनमें भोजन,पानी, परिवहन,पेट्रोलियम, तेल, लुब्रिकेंट्स, कपड़े, संचार सेवाएं, चिकित्सा सेवाएं, भंडारण सेवाएं, प्रशिक्षण सेवाएं, कलपुर्जे और कंपोनेंट्स,मरम्मत और रख रखाव सेवाएं, जांच सेवाएं, और पोर्ट सेवाएं शामिल हैं,का आदान-प्रदान किया जा सकेगा। दो तरफा साजो-सामान-आदान प्रदान सहयोग का इस्तेमाल संयुक्त अभ्यास,संयुक्त प्रशिक्षण और मानवीय सहायता तथा आपदा राहत के दौरान किया जाएगा ।

    अमेरिका को फायदा
    भारत के साथ हुए इस नए समझौते के बाद हिंद महासागर में अमेरिका की ताकत बढ़ जाएगी। हिंद महासागर में अमेरिका का सबसे शक्तिशाली बेस डिगो गार्सिया में है। 30 वर्ग किलोमीटर के इस द्वीप की भारत से दूरी तीन हजार किलोमीटर और दक्षिण चीन सागर की दूरी पांच हजार किलोमीटर है।

    भारत के लिए भी लाभकारी
    रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिकी जहाज पहले से ही भारतीय तटों पर आते रहे हैं, पर ऐसे समझौते के जरिए दोनों देश अपने करीबी रिश्ते पर मोहर लगाना चाहते हैं। वहीं भारत की नजर अमेरिका से सैन्य तकनीक हासिल करने पर है। जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार यह मान चुकी है कि अगर भारत को सुपरपावर बनना है तो अमेरिका के करीब जाना होगा।

    चीन और पाकिस्तान सावधान
    भारत और अमरीका के बीच हुए इस समझौते को लेकर चीन और पाकिस्तान की घबराहट और बढ़ने वाली है क्योंकि चीन को काबू में रखने के लिए ओबामा के कार्यकाल में यह एक महत्वपूर्ण करार है। दूसरी ओर दक्षिण चीन सागर में चीन की अकड़ के मद्देनजर भारत के साथ अमेरिका का यह समझौता बेहद अहम है। इसके साथ ही भारत और अमेरिका इस समझौते से मिलने वाली सुविधाओं का इस्तेमाल अपने समान दुश्मन और मजहबी आतंकियों के खिलाफ भी करेंगे और यह सब जानते हैं कि चीन और पाकिस्तान की दूरियां भारत और अमेरिका से लगातार बढ़ती जा रही हैं।

    चीन की घबराहट
    दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर चीन संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और पड़ोसी देशों में से किसी की नहीं सुन रहा है। इस समझौते से चीन सागर में कार्रवाई करने की अमेरिकी की क्षमता बढ़ेगी, जिससे चीन पर दबाव पड़ेगा। वहीं हिंदमहासागर और प्रशांत महासागर में भारत और अमेरिका की सक्रियता बढ़ने से चीन इस समुद्री क्षेत्र में आसानी से आगे नहीं बढ़ जाएगा।

    पाकिस्तान चिंता में
    पाकिस्तान के अखबार द डाॠन के एक लेख में लिखा गया है कि इस रक्षा समझौते का चीन-पाकिस्तान पर सीधा असर पड़ेगा। दोनों देशों को एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने और आतंकवाद के खिलाफ जंग में मदद मिलेगी। जेट इंजन तकनीक और ड्रोन तकनीक मिलने के बाद पाकिस्तान की रक्षा कमजोर होगी। यह भी लिखा है कि अमेरिका से मिलने वाले हथियारों के बल पर भारत जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों पर भी निशाना साध सकता है।

    दो और करार पर पाकिस्तान की नजर
    भारत और अमेरिका के बीच दो और समझौते की भी बातचीत चल रही है। संचार व सूचना सुरक्षा समझौता ‘सिस्मो’ और मूलभूत आदान प्रदान व सहयोग समझौता ‘बेका’। पहले समझौते के तहत अमेरिका भारत को कूटभाषा वाले संचार उपकरण देगा। इससे युद्ध या किसी सैन्य अभियान के वक्त दोनों देश सैन्य अधिकारी बेहतर तरीके से बातचीत कर सकेंगे। इससे भारतीय और अमेरिकी विमान और समुद्री जहाजों की क्षमता भी बढ़ेगी। वहीं दूसरे समझौते के तहत अमेरिका लक्ष्य निर्धारण और नेविगेशन संबंधी डाटा साझा कर सकेंगे।

    बांग्लादेश से बढ़ेगी भारत की निकटता
    बांग्लादेश में हाल ही में आईएस का प्रभाव बढ़ने की रिपोर्ट भी सामने आई है। अगर आईएस इस देश में जड़ें गहरी करने की कोशिश करता है, तो अमेरिका भारत की मदद लेकर आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। ऐसे में बांग्लादेश से भारत के संबंध और बेहतर हो जाएंगे।

    रूस के साथ कामयाब रहा था ऐसा समझौता
    9 अगस्त, 1971 को भारत-रूस ने मित्रता और सहयोग की संधि की
    20 साल की इस संधि के मुताबिक भारत को सुरक्षा पर खतरा होने की स्थिति में रूस को अत्याधुनिक हथियार देने थे
    3 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ने पर समझौते के तहत रूस ने भारत की मदद की।
    रूस के संचार सिस्टम की मदद से ही भारतीय नौसेना ने पाकिस्तान के बंदरगाह पर हमला किया। संचार के लिए रूसी भाषा इस्तेमाल की गई।

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