एक देश, एक संविधान और अब एक टैक्स

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    जब एक भारत है, एक संविधान है, एक राष्ट्रीय ध्वज है तो एक टैक्स क्यों नहीं हो? इस बात की जरूरत काफी समय से जताई जा रही थी और इसी एक बड़ी कमी के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की रैंकिंग बहुत अच्छी नहीं थी। लेकिन अब संसद में राजनीतिक दलों ने ऐतिहासिक एकजुटता दिखाते हुए देश में ‘एक टैक्स’ के पथ पर आगे बढ़ने का रास्ता साफ कर दिया। इस एक विधेयक ने भारत को विश्व का सबसे बड़ा एकल बाजार बना दिया है। यह बहुप्रतीक्षित टैक्स सुधार पासा पलटने वाला भी बताया जा रहा है। इसके लागू हो जाने से ना सिर्फ देश की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में दो प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है बल्कि यह देश में अतुलनीय आर्थिक अवसर का भी सृजन करेगा। यह भारत के विश्व बैंक के कारोबार सुगमता सूचकांक में बेहतर रैंकिंग प्राप्त करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास भी है।

    यह भी माना जा रहा है कि जीएसटी से काले धन पर लगाम लगेगी तथा अधिक प्रभावी कराधान प्रणाली का मार्ग प्रशस्त होगा। कुछ विशेषज्ञों को जीएसटी अप्रैल 2017 से लागू करना चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है। हालांकि केंद्र व राज्य दोनों इसे अगले वित्तीय वर्ष से लागू करने को तैयार बताये जा रहे हैं। वित्त मंत्रालय ने तो अपने बयान में कहा भी है कि इसे एक अप्रैल 2017 से लागू करने के पूरे प्रयास किये जा रहे हैं।
    चूंकि राज्यसभा ने जीएसटी विधेयक में कुछ संशोधन किये हैं इसलिए इन संशोधनों को लोकसभा की मंजूरी आवश्यक है। लोकसभा से भी इसके पारित होने तथा राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जीएसटी परिषद बनेगी जो आगे का खाका तैयार करेगी। कांग्रेस का कहना है कि जीएसटी दर 18 प्रतिशत से आगे नहीं जानी चाहिए लेकिन वित्त मंत्रालय का मानना है कि जीएसटी दर यदि 20 प्रतिशत भी रखी जाती है तब भी मुद्रास्फीति पर असर नहीं होगा। गौरतलब है कि संसद में पारित संविधान संशोधन विधेयक में जीएसटी दर नहीं रखी गई है। जीएसटी परिषद जिसमें कि केंद्र और राज्य दोनों का प्रतिनिधित्व होगा, जीएसटी दर पर काम करेगी। इसके बाद केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) एवं एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) जिन पर संसद के अगले शीतकालीन सत्र में चर्चा होगी, में जीएसटी दर का उल्लेख होगा।
    जीएसटी व्यवस्था से समूचा भारत वस्तु एवं सेवाओं के लिये एक साझा बाजार बन जायेगा और इससे अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा तथा खुदरा क्षेत्र को काफी मदद मिलेगी। जीएसटी पर अमल से देश में कारोबार करने की लागत कम होगी और माना जा रहा है कि इससे खाद्यान्न की बरबादी भी कम होगी तथा कीमतें भी नीचें आयेंगी। यकीनन जीएसटी 1991 के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार है जोकि भारत को विदेशी निवेश का आकर्षक गंतव्य बना देगा। राष्ट्रीय बाजार के अस्तित्व में आने से विनिर्माण अधिक प्रतिस्पर्धी भी होगा। सरकार ने भी उम्मीद जतायी है कि नये राष्ट्रीय बिक्री कर से विनिर्माण करों में कमी आयेगी लेकिन सेवा कर के संदर्भ में निर्णय राज्य और केंद्र सरकारें करेंगी।
    इस विधेयक को पारित कराना राजग के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती साबित हुआ। कांग्रेस को राजी करना आसान काम नहीं था और जब जब सरकार की ओर से कांग्रेस को मनाने के लिए प्रयास किये गये तब तब कुछ ना कुछ राजनीतिक हालात ऐसे बन गये जब इन दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों के बीच दूरी और बढ़ती हुई नजर आई। लेकिन आखिरकार कांग्रेस अपनी कुछ मांगें मनवाने के बाद इस विधेयक का समर्थन करने को राजी हो गयी। वैसे भी मूल रूप से यह विधेयक संप्रग ने ही तैयार किया था और यदि कांग्रेस इसका विरोध करती रहती तो इससे सही संदेश नहीं जाता। कुछ अन्य पार्टियों ने भी इस विधेयक का समर्थन करने का कारण यही बताया है कि कहीं उन्हें आर्थिक सुधारों की राह में रोड़ा नहीं समझ लिया जाये।
    बहरहाल, राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार उत्पाद शुल्क, सेवा कर और वैट समेत दर्जन भर से अधिक केंद्रीय और राज्य करों के सम्मिलन वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को संसद की मंजूरी दिलाने के लिए एकजुटता दिखाई वैसी ही एकजुटता यदि अन्य विषयों पर भी दिखाई जाए तो इस देश का भाग्य ही बदल जायेगा। दूसरी तरफ सरकार को भी अब यह समझ आ गया होगा कि यदि सर्वसम्मति से काम किया जाए तो संसद में विपक्ष बाधक नहीं बनेगा। वास्तव में भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संघवाद ने शानदार काम किया क्योंकि एक बड़े कर सुधार को आगे बढ़ाने के लिए सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल और राज्य सरकारें एकसाथ आयीं।
    (साभार)

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