आतंकवाद की बदलती सूरत: साइबर स्पेस के बौद्धिक आतंकवादी

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    गुरुवार को डॉ. गुलाम नबी फई का एक लेख कश्मीर टाइम्स में छपा है, जिसमें बुरहान वानी को हालात का शिकार बताते हुए, उसे बेकसूर मानने के तमाम कुतर्क दिये हैं। सैयद गुलाम नबी फई को एफबीआई ने 19 जुलाई 2011 को 35 लाख डॉलर आईएसआई से चोरी-छिपे लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। ये पैसे बयानों के कारिये कश्मीर में आग लगाने के वास्ते लिये गये थे। दो साल सजा काटने के बाद फई इस समय जेल से बाहर हैं, और कॉलम लिखने में व्यस्त हैं। हिज्बुल मुजाहिदीन के नेता सैयद सलाहुदीन, और सैयद गुलाम नबी फई बदगाम जिले में जन्मे हैं, और दोनों में गहरी छनती है। दक्षिण कश्मीर के त्राल में जन्मा बुरहान वानी को भी हिज्बुल सरगना सैयद सलाहुदीन ने अपने आइने में उतारा था।

    डॉ. फई अमेरिकी नागरिक बन चुके हैं, वहां अरबों का कारोबार है। डॉ. फई यूरोप तक कश्मीर की आकाादी के लिए लॉबी करते हैं, भारत के बहुत सारे बुद्धिजीवियों को ब्रसेल्स में आयोजित सेमिनार में बुलाते रहे हैं। गुलाम नबी फई एक ऐसा बौद्धिक आतंकवादी है, जो बंदूक से नहीं, बयानों से गोली दागता है। ऐसे लोग आतंकवादियों को अपने विचारों से पुख्ता करते हैं, उन्हें ‘रिक्रूट’ करते हैं। उससे भयानक मारकाट मचती है, और दुनिया का ध्यान उसकी ओर आकृष्ट होता है। बुरहान वानी भी सैयद गुलाम फई की तरह ‘रिक्रूटर’ रहा था, जो सोशल मीडिया के जरिये जहर फैलाता था, और सीमा पार अपने आकाओं के जरिये उन गुमराह युवाओं को नियुक्त करता था।

    मारे जाने के बाद भी बुरहान वानी उन युवाओं के लिए रोल मॉडल है, जो बिना तोप-तलवार के कम्प्यूटर, स्मार्टफोन के जरिये आतंकवाद को विस्तार दे रहे हैं। सेना और सरकार का पीठ ठोकना बंद हो जाए, तो पूछा जा सकता है कि इस समय घाटी में खासकर दक्षिण कश्मीर के पुलवामा, अनंतनाग, कुलगाम, व शोपियां में कितने ‘बुरहान वानी’ हैं, और उन्हें रोकने के लिए क्या कुछ किया जा रहा है? जो 40 लोग मारे गये हैं, उनका बुरहान वानी से कितना लेना-देना था? और बौद्धिक आतंकवादियों को निपटाने के लिए बंदूक के अलावा भी सरकार के पास कोई विकल्प है?

    आतंकवाद की सूरत बदलती जा रही है। कम्प्यूटर सैवी, पढ़े-लिखे, खाते-पीते, पब्लिक स्कूल में पढऩेवाले किशोर स्लीपर सेल के रूप में देश भर में फैल रहे हैं, यही आज के अतिवाद का सच है। जाकिर नाइक की सभा के जितने सारे फुटेज यू ट्यूब पर अपलोडेड हैं, उन्हें देखने पर पता चलता है कि कितने पढ़े-लिखे युवा उनसे मुत्तासिर हैं। जिस आतंकवाद को कुछ साल पहले तक मदरसों, गंदी गलियों, गरीबी, जहालत, बेरोजगारी से जन्मा मानते थे, अब वह पब्लिक स्कूलों, हाउसिंग सोसाइटीका के फ्लैटों, कोठियों, फाइव स्टार होटलों में पनपने लगा है। आतंकवाद में वर्ग विभेद आरंभ है। एक ओर कम्प्यूटर लिटरेट आतंकी हैं, तो उसके बरक्स बम, बंदूक लेकर जान माल को क्षति पहुंचाने वाले जिहादी। अफसोस कि पढ़े-लिखे आतंकी, और जाहिल दोनों को जन्नत जाने का लोभ है। घाटी में हुर्रियत नेताओं की संतानों को देखिये, वे सुरक्षित लंदन, सिंगापुर, हार्वर्ड के स्कूलों में शिक्षा ले रहे हैं। इन आतंकपुत्रों के हाथों में बंदूक नहीं हैं। उनका मुस्तकबिल सुरक्षित है, वे धरती पर ही जन्नत का सुख ले रहे हैं।

    इस साल फरवरी के शुरु में खबर आई कि ट्विटर ने 1 लाख 25 हजार से अधिक अकाउंट को इस शक में बंद किया कि उसके प्लेटफार्म के जरिये आतंकवाद का प्रसार हो रहा था। ‘डार्क वेब’, द ऑनियन राउटर (टीओआर) और ‘दाबिक’ जैसे ग्रुप में आइसिस के साइबर आतंकियों ने जब इंट्री ली, तब खुफिया एजेंसियों के कान खड़े हुए। ‘डार्क वेब’ साइट की सहूलियत यह रही है कि सरकारों की ऐसी-तैसी करने के लिए कुछ भी भेजिए, सारा कुछ शेयर हो जाता है। इस ग्रुप के जो लोग नेट के ज़रिये संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं, उनकी पहचान तक का पता नहीं चल पाता।

    जनवरी 2016 में आइसिस ने ‘अलरावी’ नाम से एक एंडराइड अप्लीकेशन लांच किया था। फेसबुक, टेलीग्राम, व्हाट्स अप पर लगातार दबिश के बाद आइसिस के सदस्यों ने ‘अलरावी’ के जरिये संदेश भेजने का रास्ता निकाला। ऐसे एप्स के माध्यम से हजारों मील दूर बैठे युवा आतंकी हमले करने, विस्फोटकों को तैयार करने के तरीके सीख रहे हैं। नेट के जरिये आइसिस ने ‘दाबिक’ नाम से एक बहुभाषी पत्रिका निकाली। यह प्रोपेगंडा पत्रिका आसानी से उपलब्ध है, जो प्राचीन इस्लामी शासन व्यवस्था ‘खलीफत’ की पैरोकारी करते हुए, पश्चिमी देशों पर गुरिल्ला हमले के गुर सिखाती है। दाबिक ग्रुप के सदस्य एन्क्रिप्शन (गूढ़ लेखन) कोड, एन्क्रिप्शन सॉफ्टवेयर के जरिये खुफिया एजेंसियों की मानिटरिंग से बचने के नये-नये तरीके ईकााद करते रहते हैं।

    इस साल जनवरी में नागपुर में जिन तीन युवाओं को स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम ने पकड़ा, वे दाबिक ग्रुप के संपर्क में थे, और सीरिया जाने की तैयारी में थे। संडे गार्जियन ने सितंबर 2015 में खबर दी थी कि आइसिस रिक्रूटरों के पास 15 हजार भारतीय मुसलमान युवाओं के डाटा उपलब्ध हैं। हैदराबाद में आइसिस रिक्रूटर अफसा जबीन से ‘एनआईए’ द्वारा छह दिनों की पूछताछ के बाद पता चला कि हैदराबाद, निजामाबाद, नालगोंडा के अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के पढ़े-लिखे युवाओं का डाटा बैंक आइसिस ने तैयार कर रखा है। यह सवा अरब की आबादी वाले इस देश का सिर्फ एक कोना है। ऐसे जाने कितने इलाके हैं, जहां आइसिस के अलावा देश को तोडऩे के ख्वाहिशमंद, भटके हुए युवा नेट संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं।

    सवाल यह है कि इसे खंगालने, सारे संदेशों पर नकार रखने के वास्ते क्या हमारी खुफिया एजेंसियां सक्षम हैं? 2012 में भारत सरकार की सहयोगी ‘कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम’ (सीईआरटी) ने खुलासा किया कि उस साल अक्टूबर तक 14 हजार 352 वेबसाइटें हैक की गईं थीं। हो यह रहा है कि शक के दायरे में आये लोग ‘एनआईए’ जैसी जांच एजेंसियों द्वारा उठा लिए जा रहे हैं। उसके बाद भी देश विरोधी करोड़ों संदेश ट्विटर, फेसबुक और दूसरे अकाउंट्स के जरिये घूम रहे हैं। उन्हें रोकने और ‘ब्रेन स्टॉर्मिंग’ के उपाय क्यों नहीं ढूंढे जा रहे? देश के कम्प्यूटर सैवी युवा एक वैचारिक युद्ध से गुजर रहे हैं, शायद सरकार इस सच को समझना नहीं चाहती। भारत में एक ऐसा ‘साइबर फोर्स’ चाहिए, जो पूरे सोशल मीडिया, नेट सेवाओं को खंगाल पाने में सक्षम हो। इस फोर्स के जिम्मे ऐसे संदेशों को ब्लॉक करने, अतिवाद से प्रभावित युवाओं को सही मार्ग दिखाने, इस्लाम को लेकर गलतफहमियां दूर करने, उनके हैंडलर पर नकार रखने जैसे काम होने चाहिए। वाशिंगटन स्थित ‘ब्रुकिंग इंस्टीट्यूशन’ का दावा है कि कम से कम 46 हजार ट्विटर अकाउंट्स आइसिस समर्थकों के हैं। सीआईए ने ‘न्यू डिजीटल इनोवेशन ऑफिस’ के नाम से एक नया साइबर विंग खोला है। साइबर आतंक के कारण सीआईए, एफबीआई का आमूलचूल परिवर्तन किया जा रहा है।

    सितंबर 2014 में इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ‘नेशनल साइबर डिफेंस अथॉरिटी’ बनाने की घोषणा की। इजराइल को लगा था कि हिकाबुल्ला और हमस के आतंकी अब हाईटेक हैं, उनके द्वारा साइबर हमलों को रोकने के लिए ऐसी एजेंसी की जरूरत है। इस साल फ्रांस में दूसरी बार बड़ा आतंकी हमला हुआ है। ‘फ्रेंच रीविएर’ नाम से प्रसिद्ध बंदरगाह नगर नीस में 14 जुलाई की रात ट्रक द्वारा आतंकी हमले में 84 लोगों की मौत के बाद यह सवाल तो खड़ा होता है कि ओलांद सरकार ऐसे हमलावरों को पहले से मॉनिटर करने में विफल क्यों रही है। फ्रेंच डाइरेक्टोरेट ऑफ मिल्ट्री इंटेलीजेंस (डीआरएम) पिछले एक साल से साइबर सुरक्षा विंग बनाने के प्रति गंभीर हुई है। इसे ‘डीजीएससी’ से जोड़ा गया है, जिसका काम विदेशी खुफिया एजेंसियों से तालमेल करना है। फ्रांस सरकार की एक और सुरक्षा एजेंसी ‘डीपीएसडी’ ने 2012 में 25 कम्प्यूटर सुरक्षा एक्सपर्ट को रखा। इससे साइबर अपराध के विरूद्ध फ्रांस सरकार की सुस्ती का पता चलता है।
    आतंकवाद की फैक्ट्री पाकिस्तान ने 2008 में एक अध्यादेश के जरिये तय किया कि जो लोग साइबर आतंक फैलाते हैं, उन्हें सजा-ए-मौत दी जाएगी। पाकिस्तान में इस अध्यादेश का ख़ूब दुरूपयोग हुआ। अफसोस कि एक तरफ साइबर आतंकी के लिए मौत की सजा है, दूसरी ओर कश्मीर के युवाओं को साइबर आतंक के लिए तैयार करने की मुहिम में पाकिस्तान जुटा हुआ है। 5 जुलाई 2016 को जम्मू-कश्मीर सीआईडी के हवाले से खबर छपी कि इस समय घाटी में 143 मिलीटेंट एक्टिव हैं, जिनमें 89 लोकल अतिवादी हैं, उनमें से साठ दक्षिण कश्मीर से संबंध रखते हैं। लेकिन क्या ये आंकड़े लीपा-पोती वाले नहीं लगते? इतने युवा तो श्रीनगर के लाल चौक पर पत्थरबाजी करते हुए दिख जाएंगे।

    चीन कोई साठ हजार हैकर्स की सेवाएं ले रहा है, जो दुनिया की दिग्गज कंपनियों से लेकर सरकारों तक की साइटें  हैक कर रहे हैं। चीन की ‘ब्लू आर्मी’ ने साइबर फायरवॉल को इतना सक्रिय कर रखा है कि उसे आइसिस के साइबर आतंकी भेद नहीं पाये हैं, उल्टा चीन हमले कराता है। चीन ने ‘आईपीवी- सिक्स’ जैसी इंटरनेट प्रोटोकॉल को विकसित किया हुआ है, जिससे न केवल उसकी नेट व्यवस्था निगरानी में है, बल्कि बाहरी हमले से भी वह सुरक्षित है। भारत अभी ‘आईपीवी-फोर’ का इस्तेमाल कर रहा है। हमारा साइबर स्पेस वी-चैट, स्काइप, फेसबुक, अमेजन, माइक्रोचैट, गूगल, यू ट्यूब आदि पर निर्भर है। मगर ये कंपनियां साइबर आतंक को काबू करने में भारत सरकार के लिए कितनी सहयोगी हैं, उसका पता प्रत्यक्ष रूप से नहीं चलता। ऐसा होता तो कााकिर नायक के भाषण यू ट्यूब पर उपलब्ध नहीं होते। बांग्लादेश के दो युवा आतंकी स्वीकार नहीं करते कि वे कााकिर नायक की तकरीर से प्रभावित रहे हैं, तो कााकिर द्वारा जहर उगलने का सिलसिला जारी रहता!

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