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मानवता की सेवा, प्रभु का सिमरन तथा साध संगत मानव के जीवन की खुशहाली का राज है: महात्मा अजमेर सिंह संधूू 

मानवता की सेवा, प्रभु का सिमरन तथा साध संगत मानव के जीवन की खुशहाली का राज है: महात्मा अजमेर सिंह संधूू 
गढ़दीवाला, (मनप्रीत ): परमात्मा से मिलाप से ही भक्ति की शुरूआत होती है। बिछडऩे से मिलाप का रास्ता सतगुरु की कृपा से संभव हो सकता है। इन विचारों का प्रकटावा जोनल इंचार्ज महात्मा अजमेर सिंह संधू जी ने संत निरंकारी सत्संग भवन गढ़दीवाला में ब्रांच के इंचार्ज महात्मा अवतार सिंह के नेतृत्व में आयोजित संत समागम के दौरान प्रकट किए। इस मौके पर उनके साथ कुलदीप राज, उपदेश कुमार तथा राजिंदर कुमार थे। उन्होंने प्रवचन करते हुए कहा कि मानवता की सेवा, प्रभु का सिमरन तथा साध संगत मानव के जीवन की खुशहाली का राज है। इससे दूर होने वाला इंसान आत्मिक व दुनियावी सुखों का आस नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि दूसरों के गुणों को ग्रहण करना तथा अवगुणों पर पर्दा डालने वाला गुरसिख महान गुरसिख बन जाता तथा ऐसा गुरसिख कभी अहंम व अहंकार का शिकार नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि भक्त सतगुरु व निरंकार के जितना नजदीक होता है वह उतना ही सहनशीलता व अन्य गुणों को धारण कर लेता है। गुरुओं की भावनाओं को मन में बसाने वाला इंसान की अपनी भावनाओं का त्याग हो जाता है। उन्होंने कहा कि हर इंसान में परमात्मा को देखने वाला गुरसिख कभी किसी का अपमान नहीं कर सकता वह हमेशा ही सभी का सत्कार करता है। ऐसी भावनाएं केवल गुरु से ही प्राप्त हो सकती है जिनसे समाज में शांति वाला वातावरण पैदा किया जा सकता है। जब इंसान सत्संग में आता है तो वह निरंकार प्रभु के साथ जुड़ जाता है। भक्ति करते समय जो इंसान सांस लेता है वह आनंददायक होती है। उन्होंने कहा कि जब तक यह शरीर है सुख व दुख आते ही है। साध संगत में आने से इंसान की चिंताए खत्म हो जाती है। संत महात्माओं ने हमेशा ही संतो की संगत को महत्ता दी है और इसके लिए प्रेरणा भी दी है। उन्होंने कहा कि साध संगत इंसान के जीवन में हरियाली भर देती है। इंसान को आज सबसे बड़ा दुख जन्म व मरण का है जो सतगुरु की शरण में जाकर इस निरंकार प्रभु की जानकारी करके खत्म हो जाता है। आज का इंसान सामान तो 100 वर्ष की एकत्रित कर रहा है लेकिन पता एक पल का नहीं है। प्रभु परमात्मा की जानकारी के बाद ही भक्ति शुरू होती है। जब इंसान को परमात्मा की जानकारी हो जाती है उसके बाद इंसान के मन में से अहंकार, वैर विरोध, नफरत व अन्य समाजिक बुराइयां समाप्त हो जाती है। उन्होंने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के संदेश का जिक्र करते हुए कहा कि हमें हमेशा इस निरंकार प्रभु का अहसास रखना चाहिए, जब तक इसका अहसास रहता है तब इंसान कोई गलत कार्य नहीं कर सकता। इसका डर मन में बना रहता है। इससे पहले ब्रांच के इंचार्ज महात्मा अवतार सिंह के नेतृत्व में संचालिका शशि बाला, शिक्षिका सुषमा रानी तथा सह शिक्षक डा. सुखदेव सिंह जी ने महात्मा अजमेर सिंह जी संधू को दुपट्टा पहना कर उनका स्वागत किया तथा उनका तथा सारी संगत का धन्यवाद किया। इस मौके पर ब्रांच के पूर्व मुखी महात्मा मोहन लाल, महात्मा मलकीयत सिंह रूपोवाल, जसविंदर सिंह, पल्लवी आदि सहित अन्य संत महात्माओं ने विचार रखे।

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