जेल में कंप्यूटर सीख कर इंजीनियर बन गए कैदी

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    Hoshiarpur , चारों युवाओं ने जेल के भीतर रहकर कंप्यूटर सीखा और एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया, जिसने हरियाणा की जेलों को कैशलेस और जेल प्रशासन के कामकाज को बेहद सरल बना दिया। नाम रोहित पगारे, जुर्म हत्या। नाम अनूप सिंह, बलवंत सिंह और अजीत सिंह। तीनों सजायाफ्ता अपराधी हैं और देश की राजधानी दिल्ली से सटे गुरुग्राम की भौंडसी जेल में सजा काट रहे हैं। इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि चारों युवाओं ने जेल के भीतर रहकर कंप्यूटर सीखा और एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया, जिसने हरियाणा की जेलों को कैशलेस और जेल प्रशासन के कामकाज को बेहद सरल बना दिया।
    परिणामस्वरूप चारों कैदियों का नाम लिम्का बुक में दर्ज हो चुका है और गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। जिस तरह किसी विद्यार्थी के मैरिट में आने से स्कूल का नाम रोशन होता है, ठीक उसी तरह यह सॉफ्टवेयर बनाए जाने के बाद कैदियों के साथ-साथ जेल का नाम भी लिम्का बुक में दर्ज हो गया है। यह सब संभव हुआ है जेल अधीक्षक हरेंद्र सिंह के प्रयासों से। हरियाणा ही नहीं, देशभर की जेलों में यह अपनी तरह का पहला उदाहरण है। रोचक बात यह है कि जिन कैदियों का नाम कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंप्लीमेंट के लिए लिम्का बुक रेकॉर्ड में दर्ज हुआ है, उनमें से एक भी प्रोफेशनल कंप्यूटर इंजीनियर नहीं है। कैदियों ने जेल अधीक्षक हरेंद्र सिंह से कंप्यूटर सीखने का आग्रह किया और उन्होंने इस सारी व्यवस्था को सुचारू बनाया। उक्त चारों कैदियों ने मिलकर एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया, जिससे हरियाणा की जेलें न केवल कैशलैस हो गई, बल्कि जेलों का कामकाज भी सरल हो गया है।
    जेलों के इतिहास में यह पहला मौका था, जब कैदियों को अलग-अलग 11 जेलों में सॉफ्टवेयर इंप्लीमेंट करने के लिए शिफ्ट किया गया। भौंडसी जेल में बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8सजायाफ्ता कैदी रोहित पगारे (नई दिल्ली), अनूप सिंह (रेवाड़ी), बलवंत सिंह (रेवाड़ी) व अजीत सिंह (रेवाड़ी) ने ‘फिनिक्स’ नाम के इस सॉफ्टवेयर को प्रदेश की 11 जेलों में लागू किया है। इसमें अहम बात यह है कि इस सॉफ्टवेयर को तैयार भी एक बंदी ने ही किया। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमित मिश्रा ने भौंडसी जेल में ही रहते हुए यह साफ्ॅटवेयर तैयार किया। जिस समय यह साफ्ॅटवेयर तैयार किया गया, उस दौरान ये चारों कैदी भी मिश्रा की टीम में शामिल थे। मिश्रा के बरी होने के बाद इन कैदियों के कंधों पर साफ्ॅटवेयर को जेलों में लागू करने का जिम्मा आ गया। करीब एक-एक महीना प्रदेश की 11 जेलों में रहकर इन कैदियों ने साफ्ॅटवेयर को लागू किया। भौंडसी जेल के अधीक्षक हरेंद्र सिंह के अनुसार कैदियों ने खुद ही यह इच्छा जाहिर की कि वे जेलों की कैंटीन, कैदियों के रेकॉर्ड व मुलाकात से जुड़े मामलों को कंप्यूटरीकृत करना चाहते हैं। हमने उनका सहयोग किया। हमारे लिए यह गौरव की बात है कि कैदियों की मेहनत की बदौलत न केवल उनका बल्कि जेल का नाम भी लिम्का बुक आॅफ रेकॉर्ड में दर्ज हुआ है।
    सॉफ्टवेयर से आया यह बदलाव
    राज्य की जेलों में चल रहीं सभी कैंटीन इस सॉफ्टवेयर के लागू होते ही कैशलेस हो गईं। कैदियों व बंदियों के परिजनों द्वारा उनके खातों में सीधे कैश जमा करवाया जाता है। यानी कैदियों की जेब में नकदी नहीं होती। कैंटीन में बॉयो-मीट्रिक खाता होने की वजह से वे रोजमर्रा की चीजें कैशलेस खरीद सकते हैं। पहले कैदियों से मिलने वालों को घंटों इंतजार करना पड़ता था। हर मुलाकात पर रजिस्टर में एंट्री होती थी और इसकी सूचना बंदी तक पहुंचाई जाती थी। मुलाकात में दो घंटे लग जाते थे। अब कंप्यूटर में सीधे एंट्री होती है और बंदियों तक मैसेज सीधे पहुंचता है। यानी मुलाकात में लगने वाला समय घटकर 45 मिनट से भी कम हो गया है।पुराने सिस्टम में बंदियों व कैदियों के रेकॉर्ड कागजों में चेक किए जाते थे। ‘फिनिक्स’ सॉफ्टवेयर लागू होने के बाद ये रेकॉर्ड एक क्लिक से कंप्यूटर पर आ जाते हैं। मसलन कैदी किस जुर्म में बंद है, उसे कितनी सजा हुई है, वह कितनी बार पैरोल या फर्लाे पर गया है और उसकी सजा कब पूरी हो रही है। यही नहीं, कैदियों व बंदियों की मेडिकल हिस्ट्री से लेकर कोर्ट में उनकी पेशी और अगली तारीख तक का रेकॉर्ड कंप्यूटर पर सहज उपलब्ध है।

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