क्या अमिताभ को ‘बेटी बचाओ…’ और किसान चैनल जैसी पहलों का चेहरा बनाना सही है ?

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    लगभग साढ़े पांच बजे अमिताभ बच्चन इस कार्यक्रम के मंच पर पहुंचे और उन्होंने मोदी सरकार की बहुचर्चित पहल ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ पर बात करना शुरू किया. अमिताभ बच्चन ही इस पहल के ब्रांड एंबेसडर भी हैं. लड़कियों की शिक्षा पर बोलते हुए सारा देश सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन की बातों को गौर से सुन रहा था. श्रोताओं की ओर से उठ रही तालियों की गूंज गवाही दे रही थी कि अमिताभ अपनी बातों से लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं.

    पर्दे पर भले ही अमिताभ बच्चन बेटियों की शिक्षा पर बड़ी-बड़ी बातें करते हों, उन्हें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ जैसी राष्ट्रीय पहल का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया हो, लेकिन असल में वे हजारों बेटियों को पढ़ाई के सपने दिखाकर धोखा दे चुके हैं.

    ठीक इसी समय, दिल्ली से लगभग पांच सौ किलोमीटर दूर, उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के दौलतपुर गांव में भी कुछ लोग अमिताभ को दूरदर्शन के माध्यम से सुन रहे थे. लेकिन इन लोगों को अमिताभ बच्चन की भारी और दमदार आवाज़ में बोला जा रहा हर शब्द खोखला लग रहा था. इन लोगों के पास ऐसा महसूस करने के ठोस कारण थे.

    लगभग आठ साल पहले अमिताभ बच्चन ने इन लोगों से वादा किया था कि वे इनके गांव में एक कन्या महाविद्यालय शुरू करने जा रहे हैं. वह वादा तो आज तक पूरा हुआ ही नहीं बल्कि इसके नाम पर उनके साथ अब तक जो हुआ वह छलावा ही था. इसीलिए इन लोगों का मानना है कि पर्दे पर भले ही अमिताभ बच्चन बेटियों की शिक्षा पर बड़ी-बड़ी बातें करते हों, उन्हें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ जैसे राष्ट्रीय पहल का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया हो, लेकिन असल में वे इस क्षेत्र की हजारों बेटियों को पढ़ाई के सपने दिखाकर धोखा दे चुके हैं.

    कुछ-कुछ ऐसा ही दौलतपुर के लोगों ने – जिनमें ज्यादातर किसान हैं – तब भी महसूस किया था जब अमिताभ बच्चन को पिछली साल मई में लांच हुए किसान चैनल का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था. जुलाई 2015 में यह खबर भी आई थीकि अमिताभ बच्चन को इस चैनल का ब्रांड एंबेसडर बनाने के लिए 6.31 करोड़ रुपये देना तय हुआ था.

    गांव वालों की इस मनःस्थित का कारण समझने के लिए उस कहानी को समझते हैं जिसके चलते अमिताभ बच्चन बाराबंकी के इस छोटे से गांव में स्कूल खोलने आए थे.

    बात साल 2000 की है. अमिताभ बच्चन ने महाराष्ट्र के पुणे में लगभग बीस एकड़ जमीन खरीदी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह जमीन 1960 के दशक में स्थानीय किसानों से पवाना डैम बनाए जाने के लिए अधिग्रहीत की गई थी. जब लोगों को इस जमीन की बिक्री के बारे में पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया. अप्रैल 2005 में जब यह विरोध काफी बढ़ गया तब पुणे के तत्कालीन जिलाधिकारी ने इस मामले में जांच शुरू करने के आदेश दिए.

    अमिताभ का आवंटन रद्द होना, रद्द करने वाले जिलाधिकारी का तबादला होना, नए जिलाधिकारी की नियुक्ति होना और उनके द्वारा पुराने जिलाधिकारी के आदेश पर रोक लगाना, यह सब कुछ लगभग एक महीने के भीतर ही हो गया.

    दरअसल अमिताभ बच्चन द्वारा खरीदी गई यह जमीन ‘कृषि भूमि’ थी. ‘बॉम्बे टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड्स एक्ट, 1948’ की धारा 63 के अनुसार महाराष्ट्र में ‘कृषि भूमि’ सिर्फ वही व्यक्ति खरीद सकता है जो स्वयं भी किसान ही हो. अमिताभ बच्चन को अब यह साबित करना था कि वे भी एक किसान हैं इसलिए इस जमीन को खरीदने की पात्रता रखते हैं.

    इसके लिए अमिताभ बच्चन ने पुणे में एक प्रमाणपत्र जमा किया. इस प्रमाणपत्र के अनुसार अमिताभ के पास उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में 1983 से ही कृषि भूमि थी जिस पर वे किसानी भी कर रहे थे. इस प्रमाणपत्र की जांच के लिए पुणे के जिलाधिकारी ने बाराबंकी के जिलाधिकारी को 2006 की शुरुआत में एक पत्र लिखा. उस दौर में आशीष गोयल बाराबंकी के जिलाधिकारी हुआ करते थे. उन्होंने जब इस मामले की जांच की तो पाया कि दौलतपुर गांव में ग्रामसभा की जमीन को फर्जी तरीके से अमिताभ बच्चन ने नाम आवंटित किया गया था. लिहाजा गोयल ने 24 मार्च 2006 को यह आवंटन रद्द करने का आदेश पारित कर दिया.

    यह आदेश पारित करने के कुछ दिनों बाद ही जिलाधिकारी आशीष गोयल का तबादला हो गया. उनकी जगह राम शंकर साहू को बाराबंकी का जिलाधिकारी नियुक्त किया गया. साहू ने आते ही उस आदेश पर रोक लगाने के आदेश दे दिए जिसके चलते अमिताभ बच्चन का आवंटन रद्द किया गया था. अमिताभ का आवंटन रद्द होना, रद्द करने वाले जिलाधिकारी का तबादला होना, नए जिलाधिकारी की नियुक्ति होना और उनके द्वारा पुराने जिलाधिकारी के आदेश पर रोक लगाना, यह सब कुछ लगभग एक महीने के भीतर ही हो गया. उत्तर प्रदेश में तब मुलायम सिंह यादव की सरकार थी जिनसे अमिताभ बच्चन के गहरे संबंध हुआ करते थे.

    कुछ ही समय बाद यह मामला फैजाबाद मंडल के अपर आयुक्त विद्या सागर प्रसाद की अदालत में पहुंचा. इस अदालत ने मामले की विस्तार से सुनवाई के बाद 1 जून 2007 को अपना आदेश पारित करते हुए माना कि अमिताभ को जमीन आवंटन में फर्जीवाडा किया गया था. जिस खाता संख्या 676 के जरिये गाटा संख्या 702 को 1983 से ही अमिताभ बच्चन के नाम दर्शाया गया था वह असल में ग्रामसभा की जमीन थी. न्यायालय ने यह तथ्य भी रेखांकित किया कि 1983 में जितने भी लोगों के नाम अभिलेखों में दर्ज किये गए थे, वे सभी एक ही स्याही और एक ही लिखावट में थे. जबकि खाता संख्या 676 में दर्ज ‘अमिताभ पुत्र हरिवंश राय’ का नाम अलग स्याही और लिखावट में था. इससे साफ़ था कि यह नाम 1983 में नहीं बल्कि बाद में फर्जी तरीकों से जोड़ा गया था. खाता संख्या 676 उस सूची में भी शामिल नहीं थी जो 1982 में चकबंदी अधिकारी ने जारी की थी और जिसके आधार पर 1983 में जमीन मालिकों के नाम अभिलेखों में दर्ज किये गए थे. इन तमाम बातों के आधार पर न्यायालय ने आशीष गोयल द्वारा अमिताभ बच्चन के आवंटन को रद्द करने के फैसले को सही करार दिया.

    राष्ट्रीय चैनलों पर यह खबर तेजी से फ़ैल गई कि दौलतपुर गांव की जिस जमीन के चलते अमिताभ बच्चन विवादों में आए थे, वे अब उस जमीन पर गांव की लड़कियों के लिए एक महाविद्यालय खोल रहे हैं. लेकिन यह खबर सही नहीं थी.

    इस फैसले के आते ही अमिताभ बच्चन की मुश्किलें तेजी से बढ़ने लगी. उन पर यह आरोप सिद्ध हो चुका था कि उन्होंने फर्जी तरीके से बाराबंकी के दौलतपुर गांव में ग्रामसभा की जमीन अपने नाम करवाई. इसी जमीन को आधार बनाकर वे पुणे में भी जमीन खरीद चुके थे. फैजाबाद न्यायालय के इस फैसले ने यह भी सिद्ध कर दिया था कि अमिताभ किसान नहीं हैं. लिहाजा पुणे की जमीन भी अब अमिताभ बच्चन के हाथों से निकल जाने की नौबत आ चुकी थी. इससे निपटने के लिए ही अमिताभ ने दौलतपुर में स्कूल खोलने का खेल रचा. उन्होंने एक तरफ तो फैजाबाद न्यायलय के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर की और दूसरी तरफ उस दौलतपुर गांव में सच में जमीन खरीदना शुरू किया जिसमें अब तक वे फर्जी आधार पर अपनी जमीन होने का दावा कर रहे थे.

    दौलतपुर निवासी अमरेंद्र सिंह बताते हैं, ‘अमिताभ बच्चन का जमीन विवाद चर्चा में आने बाद उनके कुछ लोग यहां आए. उन्होंने हमें बताया कि अमिताभ बच्चन इस गांव में कन्या महाविद्यालय खोलना चाहते हैं जिसके लिए उन्हें जमीन की जरूरत है. गांव वाले उन्हें जमीन देने को तैयार हो गए. इस इलाके में दूर-दूर तक कोई कन्या महाविद्यालय नहीं है. ऊपर से अमिताभ बच्चन का नाम इस गांव से जुड़ने वाला था. इसलिए हमने ख़ुशी-ख़ुशी अपनी खेती की जमीनें अमिताभ बच्चन को बेच दी. मैंने भी अपनी जमीन का एक हिस्सा उन्हें महाविद्यालय के लिए दिया था.’

    50 हजार रूपये प्रति बीघा की दर से अमिताभ ने लगभग दस बीघा जमीन गांव वालों से खरीद ली. इसके बाद 27 जनवरी 2008 के दिन अमिताभ अपने पूरे परिवार के साथ दौलतपुर गांव पहुंचे. यहां उन्होंने ‘श्रीमती ऐश्वर्या बच्चन कन्या महाविद्यालय’ का शिलान्यास किया. अभिषेक बच्चन, जया बच्चन और ऐश्वर्या राय के साथ ही सपा नेता अमर सिंह, मुलायम सिंह यादव, चंद्रबाबू नायडू, फारूख अब्दुल्ला और ओम प्रकाश चौटाला भी इस समारोह के दौरान दौलतपुर गांव में मौजूद थे.

    राष्ट्रीय चैनलों पर यह खबर तेजी से फ़ैल गई कि दौलतपुर गांव की जिस जमीन के चलते अमिताभ बच्चन विवादों में आए थे, वे अब उस जमीन पर गांव की लड़कियों के लिए एक महाविद्यालय खोल रहे हैं. लेकिन यह खबर सही नहीं थी. विवादित जमीन वह नहीं थी जिस पर स्कूल खोला जा रहा था. स्कूल वाली जमीन तो अमिताभ बच्चन ने बाद में खरीदी थी. विवादित जमीन (खाता संख्या 676, गाटा संख्या 702) इससे बिलकुल अलग थी जिसपर निचली अदालत का फैसला अमिताभ के खिलाफ आने के बाद अभी उच्च न्यायालय का फैसला आना बाकी था.

    ‘यह तर्क ऐसा ही था जैसे मैं पहले तो ताजमहल को अपनी संपत्ति बताकर बेचने निकलूं और बाद में यदि पकड़ा जाऊं तो कह दूं कि मैं ताजमहल से अपना दावा वापस लेता हूं और इसे सरकार को दे दिया जाए.’

    इस मामले में अमिताभ बच्चन के खिलाफ पैरवी कर चुके बाराबंकी के अधिवक्ता अमीर हैदर बताते हैं, ‘अमिताभ जानते थे कि उनका केस बेहद कमजोर है. निचली अदालत में वे हार चुके थे और उनकी चोरी पकड़ी गई थी. इसलिए उन्होंने उच्च न्यायालय में एक चाल चली. उन्होंने शपथपत्र देते हुए कहा कि मैं विवादित जमीन पर अपना दावा वापस लेता हूं और यह जमीन ग्राम सभा को दे दी जाए.’ अमीर हैदर आगे कहते हैं, ‘न्यायालय ने उनके इस तर्क को कैसे स्वीकार कर लिया, इस पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकता. लेकिन यह तर्क ऐसा ही था जैसे मैं पहले तो ताजमहल को अपनी संपत्ति बताकर बेचने निकलूं और बाद में यदि पकड़ा जाऊं तो कह दूं कि मैं ताजमहल से अपना दावा वापस लेता हूं लिहाजा ताजमहल सरकार को दे दिया जाए.’

    अमीर हैदर बताते हैं कि यह मामला सीधे-सीधे धोखाधड़ी का था जो अमिताभ बच्चन ने तत्कालीन मुलायम सरकार के संरक्षण में की थी. इस धोखाधड़ी के लिए उनके खिलाफ अलग से आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? इस सवाल के जवाब में अमीर हैदर कहते हैं, ‘मुलायम सरकार के दौरान जब मैंने अमिताभ के खिलाफ मुकदमा लड़ना शुरू किया था तो मुझे पहले कई प्रलोभन दिए गए और बाद में धमकियां भी. मैं पीछे नहीं हटा तो मेरा पेट्रोल तक पंप बंद करवा दिया गया था. इसके बावजूद भी मैं अपनी क्षमता के अनुसार लड़ रहा हूं. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय जाकर अमिताभ के खिलाफ आपराधिक मामले की मांग करना मेरी क्षमताओं से बाहर था.’

    इस प्रकरण में अमिताभ बच्चन का दोषी होना एक अन्य तथ्य से भी साबित होता है. पुणे में दिए गए प्रमाणपत्र के अलावा अमिताभ बच्चन ने कहीं भी बाराबंकी की जमीन को अपनी संपत्ति में नहीं दर्शाया था. 2006 में जब जया बच्चन ने राज्यसभा के लिए अपना नामांकन भरा तो उन्होंने नियमानुसार अपने पति की तमाम संपत्तियां दर्शाई थीं. लेकिन इनमें भी बाराबंकी की जमीन का कोई जिक्र नहीं था. यदि बाराबंकी की जमीन सच में 1983 से अमिताभ बच्चन की संपत्ति थी तो इसे छिपाना भी कानूनन एक अपराध था. इस तथ्य को अमीर हैदर ने चुनाव आयोग के सामने भी उठाया था जिसके बाद आयोग ने जया बच्चन के खिलाफ एफआईआर का आदेश भी कर दिया था. न्यायालय के हस्तक्षेप के चलते यह मामला आज भी लंबित है.

    इन तमाम तथ्यों के बावजूद भी अमिताभ बच्चन को तब इस प्रकरण में राहत मिल गई थी जब उच्च न्यायालय ने इस मामले को रफा-दफा करने के आदेश दे दिए. और मीडिया में यह चर्चा ही चलती रही कि विवादास्पद होने पर अमिताभ बच्चन ने अपनी जमीन पर स्कूल बनाकर उसे गांव वालों को देने को बड़ा फैसला लिया है.

    2008 में इस महाविद्यालय का शिलान्यास करने और छह महीनों के भीतर ही इसका पहला सत्र शुरू करने के वादे से ज्यादा अमिताभ ने इस दिशा में कभी कुछ नहीं किया.

    लेकिन अमिताभ का मुख्य उद्देश्य कन्या महाविद्यालय खोलना नहीं बल्कि खुद को किसान साबित करना था ताकि पुणे की कीमती जमीन को बचाया जा सके. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अब उन्होंने सही तरीका अपनाया. उन्होंने धीरे-धीरे लखनऊ के काकोरी में कृषि भूमि खरीदना शुरू किया और अंततः मायावती सरकार के कार्यकाल में ‘उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम’ ने अमिताभ को किसान होने का प्रमाणपत्र दे दिया.

    2006 में शुरू हुआ अमिताभ बच्चन के किसान होने का विवाद तो 2010 में उन्हें प्रमाणपत्र मिलने के साथ ही समाप्त हो गया, लेकिन इस दौरान उन हजारों ग्रामीणों-किसानों के सपने लगातार हाशिये पर धकेले जाते रहे जो अपने गांव में कन्या महाविद्यालय खुलने की आस लगाए बैठे थे. 2008 में इस महाविद्यालय का शिलान्यास करने और छह महीनों के भीतर ही इसका पहला सत्र शुरू करने के वादे से ज्यादा अमिताभ ने इस दिशा में कभी कुछ नहीं किया. उन्होंने शिलान्यास के कुछ महीनों बाद ही 10 लाख रुपये में खरीदी गई यह जमीन पूर्व सांसद जया प्रदा के एनजीओ ‘निष्ठा फाउंडेशन’ को दे दी थी. साथ ही महाविद्यालय बनाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने निष्ठा फाउंडेशन पर ही डाल दी थी.

    निष्ठा फाउंडेशन के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इसका कागजों से बाहर कोई अस्तित्व है भी या नहीं, कहना मुश्किल है. इस संस्था की न तो कोई वेबसाइट है न ही इंटरनेट पर इसके बारे में कोई अन्य जानकारी उपलब्ध है. जया प्रदा की अपनी वेबसाइट पर भी उनकी तमाम उपलब्धियां और सामाजिक कार्य दर्शाए गए हैं लेकिन यहां भी निष्ठा फाउंडेशन का कोई जिक्र नहीं मिलता. इंटरनेट पर निष्ठा फाउंडेशन खोजने पर लगभग आधा दर्जन संस्थाओं का जिक्र मिलता है जो इस नाम से चल रही हैं, लेकिन इनमें से कोई भी जया प्रदा की संस्था नहीं है.

    ‘इस नाम से मिलते-जुलते नाम वाली एक अन्य संस्था निष्ठा चैरिटेबल फाउंडेशन’ से जुड़े मोहम्मद उबेद बताते हैं, ‘एक जैसे नाम के चलते हमने भी कई बार जया प्रदा की संस्था के बारे में जानना चाहा लेकिन हमें कुछ पता नहीं चला. इस संस्था का जिक्र सिर्फ अमिताभ बच्चन से जुड़े जमीन विवादों में ही मिलता है.’ उबेद आगे कहते हैं, ‘हो सकता है कि इस संस्था की सच में कोई वेबसाइट न हो और यह जमीन पर काम कर भी रही हो. लेकिन ऐसा होता तो कभी न कभी इसके बारे में जरूर सुनने को मिलता. हमने आज तक कभी फील्ड पर भी इसका नाम या काम न देखा है न सुना है.’

    एक साल बाद ही अमिताभ अपने इस वादे से भी मुकर गए. 2008 में उन्होंने दोबारा पुणे जिला प्रशासन को पत्र लिखा और कहा कि वे अपना पुराना फैसला वापस लेते हैं लिहाजा यह जमीन किसानों को नहीं बल्कि उन्हीं को वापस दी जाए.

    अमिताभ ने दौलतपुर गांव में खुलने वाले कन्या महाविद्यालय को एक ऐसी संस्था के हवाले छोड़ दिया था जिसका अस्तित्व ही संदेह के घेरों में है. दौलतपुर गांव के लोगों को जब इसका पता चला तो उन्होंने इसका विरोध शुरू किया. इसके चलते अमिताभ ने यह जमीन निष्ठा फाउंडेशन से वापस लेकर ग्राम सभा को देने का फैसला लिया. लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी कन्या महाविद्यालय के निर्माण में एक ईंट तक नहीं रखी गई. आज स्थिति यह है कि असल में इस जमीन पर गांव के बच्चे क्रिकेट खेलते हैं और कागजों में इसे ‘अमिताभ बच्चन सेवा संस्थान’ के नाम दर्ज किया जा चुका है. यह संस्थान साल 2012 में बनाया गया था. इसके अध्यक्ष आईएएस अधिकारी चन्द्रमा प्रसाद यादव हैं जो मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके सचिव हुआ करते थे. दौलतपुर गांव के वर्तमान प्रधान अमित कुमार सिंह इस संस्थान के सचिव हैं.

    ‘2012 में जब यह संस्थान बना तो अमिताभ बच्चन ने महाविद्यालय के लिए पांच लाख रूपये संस्थान को दिए थे. इस पैसे से महाविद्यालय बनाना तो संभव नहीं था इसलिए हमने संस्थान के नाम से तीन बार हेल्थ कैंप लगाए जिसमें यह रकम खर्च हो गई. कुछ पैसा उस जमीन के पंजीकरण में भी खर्च हो गया जिसका पंजीकरण होना पहले छूट गया था.’ कन्या महाविद्यालय खोलने के संबंध में ग्राम प्रधान अमित कुमार कहते हैं, ‘देखा जाए तो अमिताभ जी तभी इस उद्देश्य से इतिश्री कर चुके थे जब उन्होंने यह जमीन और महाविद्यालय की जिम्मेदारी निष्ठा फाउंडेशन को सौंप दी थी. लेकिन अब यह जमीन संस्था की है और हमारा नाम भी इस संस्था से जुड़ा है तो हम अपने प्रयासों से यह महाविद्यालय जरूर बनाएंगे.’

    यदि गांव वाले स्वयं ही कन्या महाविद्यालय बनाएंगे तो क्या तब भी इसका नाम ऐश्वर्या बच्चन के नाम पर होगा? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘नहीं. यदि हम ही बनाएंगे तो फिर हम किसी स्थानीय व्यक्ति के नाम पर इसे स्थापित करेंगे.’

    अमिताभ बच्चन से जुड़ा यह एक बड़ा विरोधाभास है कि एक तरफ वे अपनी गड़बड़ियों को छिपाने के लिए हजारों बेटियों को पढ़ाई के सपने दिखाकर मुकर जाते हैं और दूसरी तरफ उन्हें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान का ब्रांड एंबेसडर बानाया जाता है. ऐसा ही कुछ विरोधाभास अमिताभ के ‘डीडी किसान’ चैनल के ब्रांड एंबेसडर होने से भी जुड़ा है.

    पुणे और बाराबंकी के विवादों के बाद जब अमिताभ काकोरी में जमीन खरीदने पहुंचे तो यहां भी वे परोक्ष रूप से किसानों का नुकसान कर बैठे.

    हालांकि ऐसी ख़बरें आती रही हैं कि अमिताभ ने समय-समय पर किसानों को कुछ वित्तीय सहायता दी है. लेकिन यदि उस प्रकरण की बात करें जो पुणे में जमीन खरीदने से शुरू हुआ और फिर अमिताभ को बाराबंकी होते हुए काकोरी तक ले गया, तो अमिताभ बच्चन का रवैय्या बेहद किसान विरोधी नज़र आता है. 2007 में जब बाराबंकी की अदालत ने यह फैसला सुना दिया था कि अमिताभ किसान नहीं हैं और अमिताभ ने विवादित जमीन से अपना दावा वापस लिया था, तब उन्होंने पुणे की जमीन भी किसानों को देने का फैसला कर लिया था.

    उस दौर में जब अमिताभ पर लगातार जमीन के फर्जीवाड़े के आरोप लग रहे थे तो उन्होंने पुणे के जिला प्रशासन को एक पत्र लिखकर बताया था कि वे यह जमीन उन किसानों को मुफ्त में लौटना चाहते हैं जिनसे कभी यह पवाना डैम के लिए अधिग्रहीत की गई थी. लेकिन एक साल बाद ही अमिताभ अपने इस वादे से भी मुकर गए. 2008 में उन्होंने दोबारा पुणे जिला प्रशासन को पत्र लिखा और बताया कि वे अपना पुराना फैसला वापस लेते हैं लिहाजा यह जमीन किसानों को नहीं बल्कि उन्हीं को वापस दी जाए.

    पुणे और बाराबंकी के विवादों के बाद जब अमिताभ काकोरी में जमीन खरीदने पहुंचे तो यहां भी वे परोक्ष रूप से किसानों का नुक्सान कर बैठे. काकोरी में खरीदी गई जमीन पर अमिताभ तो खेती करवा रहे हैं लेकिन उनके आस-पास के लगभग सभी खेतों को आवासीय जमीन में बदला जाने लगा है. यहां अमिताभ की जमीन के ठीक सामने ‘जलसा अवध रेजीडेंसी’ का दफ्तर खुल चुका है. अमिताभ के मुंबई स्थित घर के नाम पर ही ज़मीनों की खरीद-फरोख्त करने वाली इस संस्था का नाम रखा गया है. ‘जलसा अवध रेजीडेंसी’ की ही तरह इस क्षेत्र में दर्जनों प्रॉपर्टी डीलर आ बसे हैं और इस क्षेत्र की तमाम कृषि भूमि को आवासीय भूमि में बदलकर बेचा जाने लगा है. प्रॉपर्टी डीलर ग्राहकों को अमिताभ बच्चन का पडोसी बनने को ललचा रहे हैं और स्थानीय किसानों से कम दामों पर खरीदी गई जमीनों को कई गुना मंहगा बेच रहे हैं.

    हालांकि काकोरी के किसानों को हो रहे नुकसान के लिए अमिताभ बच्चन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन पुणे और बाराबंकी में जो कुछ उन्होंने अपने निजी हित साधने के लिए किया, उसे देखकर यह सवाल जरूर पैदा होता है कि क्या सच में अमिताभ बच्चन किसानों को समर्पित ‘डीडी किसान’ और लड़कियों की शिक्षा व उनके बराबरी के अधिकार को समर्पित ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ जैसी पहल के ब्रांड एंबेसडर बनाए जाने के हकदार हैं? कम से कम पुणे और बाराबंकी के वे तमाम लोग तो उन्हें इसका हकदार बिलकुल नहीं मानते जिन्होंने ‘अमिताभ बच्चन’ नाम की चमक का स्याह पक्ष बहुत करीब से देखा है.

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