अचानक कैसे कश्मीर में इतने पत्थरबाज पैदा हो गए

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    अगर आपको 1990 के दशक का कश्मीर याद हो तो आज के वर्तमान हालात की तुलना तब से की जा सकती है। अंतर सिर्फ हथियारों का आया है। दुनिया आगे बढ़ती है, कश्मीर पीछे की ओर मुड़ा है। आजादी के नारे तो वहीं पर हैं पर बंदूक गायब दिख रही है। उसका स्थान पत्थरों ने ले लिया है। कुछ इसे कश्मीर में स्टोन एज भी कह रहे हैं। कहने को कोई कुछ भी कहे पर कड़वी सच्चाई यह है कि कश्मीर को समय के चक्र में उलझाने में अब राजनीति भी अहम भूमिका निभाने लगी है। पहले सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान, पाकिस्तानी सेना तथा उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को हालात के लिए दोषी ठहराया जाता रहा था। पर अब भीतरी ताकतें भी शामिल हो चुकी हैं।

    कश्मीर के हालात को हमेशा बेरोजगारी से जोड़ा जाता रहा है। जब 1990 के दशक में कश्मीरियों ने बंदूक उठाई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला भी यह कहने से चूकते नहीं थे कि बेरोजगारी से त्रस्त कश्मीरी बंदूक उठाने को मजबूर हुआ है। और अब जब कश्मीरियों ने बंदूक की जगह पत्थर उठाए तो भी तर्क वही हैं। कश्मीरी कौम कभी झगड़ालू नहीं रही है। तभी तो दो कश्मीरियों की लड़ाई एक-दूसरे पर कांगड़ियों को फेंकने से अधिक कभी नहीं बढ़ पाई थी। मगर अब पत्थरबाजी के हथियार से वे बड़े-बड़ों को डरा रहे हैं। अगर यूं कहें कि कश्मीर और कश्मीर आने वाले पत्थरबाजी के बंधक बन चुके हैं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
    सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक कैसे कश्मीर में पत्थरबाज पैदा हो गए। इस पर हैरानगी सिर्फ राजनीतिक पंडितों को ही नहीं बल्कि हुर्रियती नेताओं को भी है। वे हैरान हैं। परेशान भी हैं। उनकी परेशानी यह है कि पत्थरबाज रूपी उनके कथित समर्थक उनका भी कहना मानने को राजी नहीं हैं। अगर कट्टरपंथी सईद अली शाह गिलानी हड़ताल न करने और उसके स्थान पर कोई विकल्प तलाशने को बुद्धिजीवियों की राय मांगते थे तो पत्थरबाज उनके आह्वान को ठेंगे पर रखते हुए अपनी उस दुकान को जारी रखते थे जिसे पोषित करने वाले अब नेशनल कांफ्रेंस के साथ-साथ हुर्रियत कांफ्रेंस के निशाने पर भी हैं।
    आम कश्मीरी से लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और हुर्रियत कांफ्रेंस तक के इशारे और बयान का निशाना पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ही है। हुर्रियत के मौलवी अब्बास अंसारी कहते हैं कि पीडीपी पत्थरबाजों को शह दे रही है तो उमर अब्दुल्ला अपने संदेश में स्पष्ट तौर पर कहते थे कि पीडीपी नेताओं के बच्चे और रिश्तेदार पत्थरबाजी में लिप्त हैं जो सत्ता हाथ से चले जाने के बाद से ही उनकी सरकार को क्षति पहुंचाने के इरादों से अवसर ढूंढ रहे थे। अगर आम कश्मीरी की बात सुनें तो उनके उस वक्तव्य से गहरे अर्थ निकाले जा सकते हैं जिसमें वे कहते थे कि कांग्रेस-पीडीपी की सरकार में ऐसा नहीं होता था।
    वर्तमान परिस्थितियों के लिए सिर्फ पीडीपी को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पाकिस्तानी सेना की खुफिया संस्था आईएसआई लश्करे तौयबा के साथ मिल कर नई-नई चालें कश्मीर की बर्बादी के लिए चल रही हैं। सीमाओं पर सीजफायर शुरू होने से पहले तक कश्मीर में गरजती बंदूकों के लिए असलाह इस ओर आने में कोई परेशानी नहीं थी तो आतंकियों की बंदूकें कश्मीर भर में दनदनाती रही थीं। और सीजफायर के बाद पाकिस्तान ने रणनीति बदल ली। कश्मीर में पत्थरबाजों की फौज को तैयार कर दिया गया। यह सवाल अलग है कि पत्थरबाजों को कौन पाल रहा है, लेकिन उन्हें शह, पैसा और रणनीति पाकिस्तान समर्थित लश्करे तौयबा की ओर से ही मिल रही है इसके प्रति अब कोई शक नहीं रह गया है।
    अभी तक लश्करे तौयबा से कश्मीरी नफरत करते थे। विदेशी आतंकियों के गुट लश्कर के आतंकियों ने कश्मीरियों पर जबरदस्त कहर बरपाया था। पाकिस्तान इससे परेशान हो उठा था। पर अब वह खुशी से फूला नहीं समा रहा। पत्थरबाजों के दम पर और केंद्रीय रिजर्व पुलिस की ‘मेहरबानी’ से वह कश्मीर के हालात को फिर से 1990 के दशक में वापस लाने में कामयाब हुआ है। 1990 के दशक में बंदूकधारियों को जबरदस्त जनसमर्थन प्राप्त था। आजादी के नारे लगाती भीड़ की आड़ लेकर सुरक्षा बलों पर गोलियां बरसाने वाले आतंकी अब पत्थरबाजों की भीड़ का सहारा ले रहे हैं। बदले में सुरक्षा बलों की फायरिंग में मासूमों की मौतें कश्मीर को पीछे की ओर धकेल रही हैं। लश्करे तौयबा तथा पाकिस्तान के दोनों हाथों में लड्डू हैं। आतंकवाद को दबाने में जो कामयाबी पाई गई थी वह पत्थरबाज मिट्टी में मिला रहे हैं। एक रक्षाधिकारी के बकौल, अगर ऐसा ही जारी रहा तो कश्मीर में नए किस्म का आतंकवाद पनपने का खतरा पैदा हो जाएगा जिसे काबू पाना कठिन हो जाएगा।
    स्थिति पर काबू पाने की खातिर पत्थरबाजों के पुनर्वास की कोशिशें भी जारी हैं। उन्हें पकड़ कर पीएसए लगा जेलों में ठूंसने की प्रक्रिया भी जारी है। पर बावजूद इसके माहौल को बिगाड़ने की कोशिशें राजनीति के चलते तेज हुई हैं। अलगाववादियों के पास तो एकसूत्रीय कार्यक्रम मानवाधिकारों के हनन का है। इसके लिए वे सुरक्षा बलों की तैनाती तथा उनको मिले अधिकारों को दोषी ठहराते हैं। सत्ता से बाहर रहने पर पीडीपी भी यही बोली बोल रही थी। अब वह अपने बोल भूल गई है। रोचक बात यह है कि जब पीडीपी कांग्रेस के साथ मिल कर सत्ता सुख भोग रही थी तो उस समय उसे सुरक्षा बलों की न इतनी संख्या नजर आई थी और न ही सुरक्षा बलों को मिले विशेषाधिकारों के प्रति उसने कभी चिंता प्रकट की। बस सत्ता क्या हाथ से खिसकी कि राजनीतिक मान-मर्यादा का पर्दा भी खिसक गया।
    कश्मीर को दोजख बनाने के मुद्दों की गहमगहमी में इसे नहीं भूला जा सकता कि पिछले कुछ सालों से कश्मीर वादी के हालात को सांप्रदायिकता के साथ जोड़ने की भरपूर कोशिश हो रही है। लगातार पांचवां साल है जबकि कश्मीर में तभी हड़तालों और बंद का मौसम लौटा है, जब पर्यटन सीजन चरमोत्कर्ष पर था और हिन्दुओं की पवित्र समझे जाने वाली अमरनाथ यात्रा की शुरूआत हुई थी। 2008 में तो अमरनाथ यात्रा ने ही कश्मीर को नर्क में धकेल दिया था। अगला साल शोपियां की दो युवतियों के अपहरण और बलात्कार की भेंट चढ़ गया था। पिछले साल के टूरिस्ट सीजन को फर्जी मुठभेड़ों ने लील लिया और इस बार जब टूरिज्म पटरी पर आने लगा और कश्मीरी दोनों हाथों से कमाने लगे तो पाकिस्तान से यह सब देखा नहीं गया। नतीजा सामने है।
    कश्मीर के हालात को थामने के लिए सुझाव देने वालों की भी कमी नहीं है। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो पत्थरबाजों के साथ ठीक उसी प्रकार निपटा जाना चाहिए जिस प्रकार आतंकियों से निपटा जाता है। पर तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि कश्मीर कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि यह राजनीतिक तौर पर सुलझाया जाना चाहिए जिसके लिए वे अपनी पार्टी की विचारधारा और मांग आटोनोमी से आगे भी जाने को तैयार हैं। उनके बकौल, अगर जनता आटोनोमी से अधिक कुछ स्वीकार करना चाहती है तो वे उनके साथ हैं। उनका यह बयान कश्मीर की राजनीति में नया मोड़ जरूर लाने वाला है यह आशंका प्रकट करने वालों में नेकां के ही नेता हैं जो उमर अब्दुल्ला के बयान को कश्मीर की आजादी से जोड़ने लगे हैं।

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