हार्ले डेविडसन, जनरल मोटर्स, फोर्ड, सिटी बैंक.. भारत से बाहर क्यों निकल रहीं कंपनियां? हडसन इंस्टीट्यूट की चेतावनी

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नई दिल्ली: मोदी सरकार ने सत्ता में आने के कुछ समय बाद ही मेक इन इंडिया (Make In India) पहल की शुरुआत की। मकसद सिर्फ इतना था कि विदेशों से निवेश (FDI in India) भारत आए और विदेशी कंपनियां यहां आकर मैन्युफैक्चरिंग करें। मोदी सरकार की इस पहल के तहत कई विदेशी कंपनियां भारत आई भी, लेकिन ऐसी कंपनियों की भी लंबी लिस्ट है, जो देश छोड़कर बाहर चली गईं। इस लिस्ट में हार्ले डेविडसन, जनरल मोटर्स, फोर्ड और सिटी बैंक जैसे बड़े ब्रांड भी शामिल हैं। इसे लेकर अमेरिका के हडसन इंस्टीट्यूट ने भी चेतावनी दी है।

कितनी कंपनियों ने छोड़ा देश?

जब भारत खुद को चीन के एक विकल्प के तौर पर पोजीशन करने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में विदेशी कंपनियों का भारत छोड़कर जाना चिंता की बात है। अगर सिर्फ 2014 से 2021 तक की बात करें तो 2783 विदेशी कंपनियों ने भारत में अपना बिजनस बंद कर दिया है। इस बात की पुष्टि खुद वाणिज्य उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने पिछले साल संसद में की थी। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, क्योंकि भारत में सिर्फ 12,458 विदेशी कंपनियां ही बिजनस कर रही हैं।

हडसन इंस्टीट्यूट ने दी चेतावनी

हाल ही में अमेरिका के वॉशिंगटन के हडसन इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हुसैन हक्कानी और अपर्णा पांडे ने The Hill में एक ओपिनियन पीस लिखा था। उसमें दोनों ने जो बाइडन को चेताया था कि भारत से अमेरिकी कंपनियों को बाहर जाना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा था कि कई विदेशी कंपनियों ने भारत में अपनी लंबी अवधि की योजनाओं को होल्ड पर रखा है। यह अमेरिका के लिए इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि अमेरिका हमेशा से ही भारत को ग्रोथ करते हुए देखना चाहता है, ताकि वह चीन की बढ़ती ताकत से आसानी से निपट सके।

गिर रहा भारत में विदेशी निवेश

हुसैन हक्कानी और अपर्णा पांडे के अनुसार भारत को अपना सहयोगी मानने वाले पश्चिमी देश भी यह मानते हैं कि वह आर्थिक और मिलिट्री की ताकत को सिर्फ तभी बढ़ा सकेगा, अगर उसकी ग्रोथ रेट अच्छी रहेगी। और यह सब सिर्फ तभी मुमकिन होगा जब भारत में विदेशी निवेश तेजी से आए। आपको बता दें कि वित्त वर्ष 2021-22 में भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी एफडीआई गिरकर 58.77 अरब डॉलर रह गया, जो एक साल पहले 59.64 अरब डॉलर था।

विदेशी कंपनियों को क्यों रास नहीं आ रहा भारत?

वैसे तो अधिकतर कंपनियों के भारत से बाहर जाने की वजह अलग-अलग कंपनी के लिए अलग-अलग है, लेकिन कुछ कंपनियों के भारत को अलविदा कहने की वजह भारत की पॉलिसी हैं। अधिकतर कंपनियां तो अपना नुकसान कम करने से लिए रीस्ट्रक्चरिंग की वजह से गईं या फिर वह भारत के प्राइस सेंसिटिव मार्केट को क्रैक नहीं कर पाईं। वहीं कई ऐसी भी कंपनियां रहीं, जिन्होंने रेगुलेटरी दिक्कतों, तगड़े टैरिफ, लैंड एक्विजिशन पॉलिसी, इंफ्रास्ट्रक्चर या फिर भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनस बेहतर ना होने के चलते भारत से बाहर जाने का फैसला किया है।

भारत आने से क्यों कतरा रही हैं विदेशी कंपनियां?

Avantis RegTech के सीईओ-फाउंडर ऋषि अग्रवाल और ORF के वाइस प्रेसिडेंट गौतम चिकरमणे कहते हैं भारत अभी रेगुलेटरी कोलेस्ट्राल की समस्या झेल रहा है, जो ईज ऑफ डूइंग बिजनस के रास्ते का रोड़ा बना हुआ है। उनका मानना है कि कंपनियों को लेकर राज्य और केंद्र सरकार के नियमों और कानूनों ने किसी कंपनी का बिजनस करना मुश्किल बनाया है। अब माना जा रहा है कि अगर इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का पीएम मोदी का सपना सच होने की राह आसान नहीं होगी। यही वजह है कि पिछले साल जब सरकार ने भारत में चिप बनाने के लिए दुनिया की बड़ी कंपनियों को न्योता दिया और 10 अरब डॉलर का इंसेंटिव तक देना का प्रलोभन दिया, लेकिन उन कंपनियों ने भारत का रुख नहीं किया।

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