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पंचायत चुनावों पर ‘अनिश्चतता’ बरकरार, कैबिनेट ने अब तक नहीं लिया अंतिम फैसला

पंचायत चुनावों पर ‘अनिश्चतता’ बरकरार,  कैबिनेट ने अब तक नहीं लिया अंतिम फैसला

जनगाथा / श्रीनगर / ऑल पार्टी मीटिंग (ए.पी.एम.) के ढेढ़ महीने बीतने के बावजूद सरकार प्रदेश में पंचायत चुनावों के आयोजन पर अभी तक कोई फैसला नहीं ले पाई है जिसके चलते जम्मू कश्मीर में पंचायत चुनावों पर ‘अनिश्चितता’ बरकरार है। गत 4 फरवरी को मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सभी राजनीतिक दलों के विचारों को सुनने के लिए ऑल पार्टी मीटिंग की अध्यक्षता की थी जिसके बाद सरकार ने कहा था कि अंतिम फैसला कैबिनेट द्वारा लिया जाएगा। वहीं, वरिष्ठ पी.डी.पी. नेता और संसदीय मामलों के मंत्री अब्दुल रहमान वीरी ने हाल ही में विधानसभा को सूचित किया था कि पंचायत चुनावों के आयोजन पर अंतिम फैसला राज्य कैबिनेट द्वारा लिया जाएगा।

हालांकि, सूत्रों के अनुसार तब से कई कैबिनेट बैठकों का आयोजन किया गया लेकिन इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया। संबंधित अधिकारी ने कहा कि पंचायत चुनावों का मुद्दा कैबिनेट बैठकों में नहीं उठाया गया। साथ ही अभी भी भ्रम हैं कि क्या पंचायत चुनाव होंगे या नहीं। पंचायत चुनावों का आयोजन 2016 में किया जाना था लेकिन घाटी में अशांति की वजह से स्थगित कर दिया गया। वर्ष 2017 में घाटी में नागरिक हत्याओं और मुठभेड़ों में वृद्धि की वजह से पंचायत चुनावों का आयोजन फिर से नहीं किया गया। हालांकि, पिछले साल 25 दिसंबर को मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अचानक घोषणा कर दी थी कि राज्य में पंचायत चुनावों का आयोजन 15 फरवरी से किया जाएगा।

सरकार पर चुनाव करवाने का दवाब 
सूत्रों के अनुसार भाजपा राज्य में पंचायत चुनावों का आयोजन कराने के पक्ष में थी। भाजपा के एक नेता ने कहा कि भाजपा नेतृत्व पर यह दबाव बढ़ रहा था कि राज्य में चुनावों का आयोजन किया जाना चाहिए। चुनावों को स्थगित करने से यह संकेत मिला कि सरकार अलगाववादियों और आतंकियों की धमकियों के सामने झुक गई।
हालांकि, गत 24 जनवरी को शोपियां जिला में नागरिक हत्याओं के बाद घाटी में मौजूदा तनाव के मद्देनजर पी.डी.पी. चुनावों का आयोजन करने के पक्ष में नहीं थी।
नैशनल कांफ्रैंस (नैकां) और कांग्रस सहित विपक्षी दलों ने भी सरकार पर पंचायत चुनावों का आयोजन कराने के लिए अचानक घोषणा करने पर सवालिया निशान उठाया।

2016 में पंचायतों का कार्यकाल हुआ था समाप्त
पंचायतों ने जुलाई 2016 में अपना कार्यकाल पूरा किया था। पिछली बार पंचायत चुनावों का आयोजन उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नैकां-कांग्रेस गठबंधन सरकार के दौरान अप्रैल-मई 2011 में 37 सालों के अंतराल के बाद किया गया था और लगभग 79 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। जम्मू कश्मीर में 35096 पंच निर्वाचन क्षेत्रों के साथ 4490 पंचायतें हैं।

अलगाववादियों ने चुनाव का किया था बहिष्कार
सैयद अली शाह गिलानी, मीरवायज उमर फारुक और मोहम्मद यासीन मलिक सहित अलगाववादी नेताओं ने पंचायत चुनावों का बहिष्कार करने का आह्वान किया था।

चुनाव टलने से हो रहा है नुकसान
पंचायत चुनावों का आयोजन नहीं होने की वजह से प्रदेश को बडें पैमाने पर केन्द्रीय वित्तपोषण का नुकसान उठाना पड़ रहा है। सूत्रों ने कहा कि यदि पंचायत चुनावओं का आयोजन नहीं किया गया तो प्रदेश को 2015 से 2020 तक 4 हजार करोड़ से ज्यादा नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

चुनाव नहीं हुए तो नहीं मिलेगा फंड
उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में निर्वाचित पंचायतों के साथ कई अनुदानों को जोड़ा है और इन अनुदानों को सुरक्षित रखने के लिए चुनावों का आयोजन कराना सरकार के लिए अनिवार्य है। यदि नई पंचायतों का गठन होगा तो राज्य सरकार अनुदानों को मांग सकती है, जो कई करोड़ है और ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत विकास कर सकती है।

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