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एसएवी जैन डे बोर्डिंग स्कूल में डाक टिकट संग्रह व पोटर वील संबंधी प्रतियोगिता आयोजित

एसएवी जैन डे बोर्डिंग स्कूल में डाक टिकट संग्रह व पोटर वील संबंधी प्रतियोगिता आयोजित

 

जनगाथा , होशियारपुर। सुन्दर और उपयोगी वस्तुओं का संग्रह मानवता का स्वभाव है। हर चीज को संग्रह करने में मजा है और हर एक चीज के संग्रह के साथ कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त होता है लेकिन डाक टिकटों के संग्रह का मजा कुछ और ही है। उक्त बात एसएवी जैन डे बोर्डिंग स्कूल के शिक्षा निधी के प्रधान यशपाल जैन व सचिव संदीप जैन के दिशानिर्देशानुसार इंडियन पोस्टल, माइ स्टैंप और रिपब्लिक पोटर वील संबंधी सुपरीटैंडैंट पोस्ट आफिस विभाग द्वारा पोस्टल एस्टिैंट लवप्रीत की देखरेख में प्रतियोगिता करवाई गई। इस संबंधी जानकारी देते हुए लवप्रीत ने बताया कि यह प्रतियोगिता एक नैशनल स्तर की प्रतियोगिता थी और इसमें बच्चों द्वारा बनाई गई डाक टिकट में से चुनी हुई टिकटों पर रिवार्ड भी रखे गए हैं, जिसमें पहले स्थान वाले को 50 हजार, दूसरे स्थान पर 25 हजार और तीसरे स्थान पर रहे विद्यार्थी को 10 हजार रुपए की नकद राशि का इनाम रखा गया है और 5 एेंट्रियां ऐसी हैं जिन्हें 5 हजार रुपए हर बच्चे को दिए जाएंगे। प्रतियोगिता से पहले उपस्थित बच्चों को संबोधित करते हुए लवप्रीत ने कहा कि हर डाक टिकट किसी न किसी विषय की जानकारी देता है। अगर हम इस छुपी हुई कहानी को खोज सकें तो यह हमारे सामने ज्ञान की रहस्यमय दुनिया का नया पन्ना खोल देता है। इसीलिए तो डाक टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौक में से एक है। उन्होंने कहा कि डाक टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने को प्रेरित करता है, इसलिए इस प्राकृतिक शिक्षा उपकरण कहा जाता है। डाक टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, एेतिहासिक घटनाएं, भाषाएं, मुद्राएं, पशु पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवन शैली एवं देश के महानुभावों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस अवसर पर स्कूल शिक्षा निधी के सचिव संदीप जैन ने बताया कि डाक टिकट का इतिहास करीब 169 साल पुराना है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था, जिसके ऊपर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। इसके उपयोग का प्रार भ 6 मई 1840 से हुआ। भारत में पहला डाक टिकट 1 जुलाई 1852 में सिंध प्रांत में जारी किया गया जो केवल सिंध प्रांत में उपयोग के लिए सीमित था। आज आपको लगभग हर देश के अपने अपने डाक टिकटों की बेहतरीन श्रृंखला मिल जाएगी। कुछ लोग एेसी भी मिलेंगे जिन पर डाक टिकटों का संग्रह करने का एेसा जनून सवार रहता है कि उनके पास शुरू से लेकर अब तक के अधिकांश डाक टिकट मिल जाएंगे। डाक टिकटों के ऐसे शौकीनों की दुनिया भर में कोई कमी नहीं है। डाक टिकट जितना पुराना और दुर्लभ होता है उसकी कीमत भी उतनी ही बढ़ जाती है और पोस्टेज स्टैंप डाक टिकटों का संग्रह करने के शौकीन कुछ व्यक्ति तो उसे हासिल करने के लिए मुंहमांगी कीमत देने को भी तैयार रहते हैं। इस सैमीनार में स्कूल के डीन सुनीता दुग्गल व प्रिंसीपल सुषमा बाली व अन्य स्टाफ सदस्य भी मौजूद थे।

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