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गुरू अपने शिष्य का ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करते है जिसे काल भी नही भेद सकता -नीतिविधा भारती

गुरू अपने शिष्य का ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करते है जिसे काल भी नही भेद सकता -नीतिविधा भारती

जनगाथा / होशियारपुर / दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के गौतम नगर आश्रम में प्रवचन करते हुए श्री आशुतोष महाराज जी कि शिष्या साध्वी नीतिविधा भारती जी ने अपने विचारो मेंं कहा कि गुरू अपने शिष्य का ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करते है जिसे काल भी नही भेद सकता साथ ही अपनी कृपामयी किरणों से शिष्य के सभी अवगुणों को नष्ट कर देते है या सांसारिक रिश्ते ऐसा अटूट नाता निभा सकते है कदपि नही । माता,पिता,पुन्न,भाई,बहन आदि ये सभी सांसारिक रिश्ते ही ज्यादा से ज्यादा तब तक साथ है जब तक शरीर जीवित है। मुत्यु के बाद तो करीबी से करीबी रिश्ता भी साथ निभाने मे असमर्थ होता है लेकिन गुरू तो शिष्य की आत्मा से सबन्ध जोड़ते है शरीर से नही वे तो जन्मों जन्मों तक अपने शिष्य का ध्यान रखते है पल भर के लिए भी उस पर से अपनी दृष्टि नही हटाते तब तक उस के सग चलते है जब तक वह अपनी मंजिल को नही पा लेता इस के लिए युगों -युगों तक भी उस का इंतजार करते है। इंतजार भी ऐसा जिस में कण भर का स्वार्थ नही कही कोई माँग नही केवल और केवल शिष्य के उद्रार की भावना वही हम संसार की ओर देखे प्रत्येक रिश्ते में स्वार्थ की दुर्गन्ध समाई होती है रिश्ते इंसान से नही बल्कि उस के धन और शैहरत से जोड़े जाते है धन आते ही हजारों लोग हमारे मिन्न और श्श्तिेदार बन जाते है पर नाम प्रतिष्ठा पैसा ये सब गए नही कि हमारे सगे भी हम से किनारा कर लेते है पहचाने तक से भी इंकार कर देते है 1या स6भव है कोई तुलना इन स्वार्था रिश्तो को गुरू के निस्वार्थ स6बन्ध से नही इसलिए गुरू का अभिनंदन करते है जो प्रत्यक्ष रूप से हमारी भीतर ही परमात्मा का बोध करा सके।

 

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