भागदौड़ की ज़िंदगी में बेसहारा लोगों का सहारा बने डॉ . सुखमीत और रुपिंदर

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    होशियारपुर । इस जमी पर अगर किसी को भगवान का दर्जा दिया गया है तो वह डॉक्टर ही हैं जो लोगों को नई जिंदगी देते हैं। अस्पतालों में तो लोगों को जिंदगी देने वाले लाखों-करोड़ों डॉक्टर मिल जाते हैं लेकिन होशियारपुर के दो डॉक्टर ऐसे भी हैं जो सिर्फ लोगों की जिंदगी बचाते ही नहीं हैं उसे संवारते भी हैं। इसके लिए वह किसी से कोई फीस नहीं लेते बल्कि खुद अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा खर्च करते हैं। हम बात कर रहे हैं एक ऐसे डॉक्टर दंपति की जो मासूम और जरूरतमंद गरीब बच्चों के लिए किसी भगवान से कम नहीं। पिछले 15 वर्षों से धरती के यह भगवान मासूम और जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी संवारने का काम कर रहे हैं। होशियारपुर की डॉक्टर सुखमीत बेदी और रुपिंदर बेदी समाज सेवा के क्षेत्र में भी अहम भूमिका निभाते हुए गरीब और जरूरतमंद बच्चों को शिक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। उनका मानना है कि श्रद्धा ज्ञान देती है,नम्रता मान देती है, और योग्‍यता स्‍थान देती है। पर तीनों मिल जाए तो व्‍यक्ति को हर जगह सम्‍मान देती है

    बेबस बच्चों के अरमान पूरे कर रहे ये धरती के भगवान
    -अपनी कमाई का दसवंद निकाल, जरूरतमंदों और बेसहारा लोगों की सेवा पर खर्च करता है डॉक्टर दम्पति
    – भागदौड़ की ज़िंदगी में बेसहारा लोगों का सहारा बने डॉ . सुखमीत और रुपिंदर
    श्रद्धा , नम्रता , और योग्‍यता का सुमेल हैं डॉ सुखमीत और रुपिंदर
    रुपिंदर अपना डेंटल क्लिनिक चला रहे हैं जबकि डॉ सुखमीत बेदी रयात बाहरा ग्रुप में बतौर मेडिकल अफसर सेवा दे रहे हैं । डॉ. रुपिंदर बताते हैं कि उनके पिता रिटायर्ड प्रिंसिपल अवतार सिंह बेदी और माता सतनाम बेदी गरीब बच्चों को शिक्षित करते थे और उन्हीं से उन्होंने समाज सेवा की प्रेरणा ली थी। डॉ .सुखमीत का जन्म लुधियाना के एक मिडिल क्लास परिवार में हुआ था । ,इसके बावजूद उनकी मां रविंद्र कौर और पिता हरमिंदर सिंह जरूरतमंदों की सेवा में लगे रहते थे । माता पिता को समाज सेवा में लगा दे उनके मन में भी यह भावना बचपन से ही घर कर चुकी थी। पति और ससुर का साथ मिला तो वह भी निकल पड़ी मासूम बेसहारा जरूरतमंद बच्चों का भविष्य संवारने के लिए । देखते ही देखते 15 साल कब गुजर गए पता ही नहीं चला । डॉक्टर सुखमीत बीडीएस में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। वह चाहती तो देश-विदेश में अपने पेशे को रोजगार बनाकर अथाह पैसा कमा सकती थी लेकिन उन्होंने समाज सेवा को नहीं छोड़ा । सिर्फ बच्चों को शिक्षित करने की ही बात नहीं है बल्कि यह दंपति जरूरतमंदों का इलाज भी मुफ्त में करता है । यह इनकी सेवा भावना ही है कि अब तक लगभग 150 से भी अधिक मेडिकल कैंप फ्री लगा चुके हैं। इनकी सेवा भावना को देखते हुए जिला प्रशासन ने 2018 में महिला दिवस के मौके पर डॉ. सुखमीत को सम्मानित किया और डॉ. रुपिंदर को भी उनकी सेवाओं के लिए विभिन्न संस्थाओं ने सम्मान दिया । डॉ. रुपिंदर पंजाब यूनिवर्सिटी के मेडिकल फैकल्टी के एडेड मेंबर भी हैं। वह जिला ताईकाण्डों के वाईस प्रेजिडेंट डॉक्टर सुखमीत कहती हैं कि मेरे सास ,ससुर ने हमेशा हमें इसके लिए प्रेरित किया। उनका साथ ना होता तो यह मुकाम हासिल करना बेहद मुश्किल था। पति और ससुराल वालों ने मेरी भावना को हमेशा सम्मान दिया और मेरी सेवा को सराहा। डॉक्टर दंपति ने ज्यादातर मेडिकल कैंप या तो स्कूलों में लगाए या फिर गांव की जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ दिलाने के लिए लगाए । वर्ष 2004 में सुखमीत और रुपिंदर शादी के अटूट बंधन में बंध गए थे और शादी के साथ ही उनका समाज सेवा का सफर भी शुरू हुआ । शादी की तरह समाज सेवा से भी उनका रिश्ता अटूट है। गरीब मासूम की जिंदगी संवारने का यह सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है। इनकी सेवा भावना और सादगी के लिए बस इतना ही कहा जा सकता है
    किसी को हो ना सका उसके कद का अंदाजा ,
    वो आसमां है मगर सर झुका कर चलता है।

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