घरेलू हिंसा अधिनियम : क्या आप जानते हैं ये बड़ी बातें

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      जनगाथा  /   नई दिल्ली   /  आए दिन हम अखबार और टी वी चैनलों पर महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के बारे में पढ़ते हैं। कहीं दहेज के लालच में महिलाओं को जला दिया जाता है तो कहीं ससुराल वालों और पति द्वारा उन्हें पीटा जाता है। हर रोज ना जाने कितनी महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। समाज में हो रहे ऐसे अत्याचारों की खबरें हम पढ़ते हैं और फिर भूल भी जाते हैं। इसके खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम बनाया गया है लेकिन जानकारी ना होने के कारण महिलाएं इसका फायदा नहीं उठा पाती हैं।

    क्या है घरेलू हिंसा अधिनियम

    महिला बाल विकास द्वारा संचालित इस अधिनियम की शुरूआत साल 2005 में हुई और 26 अक्टूबर 2006 को इसे लागू किया गया। घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं की शिकायत सुनने के लिए मंत्रालय द्वारा जोन अनुसार आठ संरक्षण अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। यह अधिकारी पूरी जांच पड़ताल के बाद प्रकरण को न्यायालय भेजते हैं।

    यह अधिनियम उन सभी महिलाओं के लिए है जो अपने घरों में किसी भी प्रकार की हिंसा से पीड़ित हैं। इसमें कई प्रकार की हिंसा शामिल है जैसे किसी महिला को अपशब्द कहना, या किसी प्रकार की रोकटोक और मारपीट करना आदि।

    इस अधिनियम के तहत महिलाएं हर उस पुरूष के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकती हैं जो उनके साथ हिंसा करता है। इसमें महिलाओं का हर रूप मां, भाभी, बहन, पत्नी, किशोरियाों को शामिल किया गया है।

    यै है घरेलू हिंसा अधिनियम की वास्तविकता

    महिलाओं का कहना है कि घरेलू हिंसा अधिनियम उनके लिए जितना सहायक दिखता है वास्तिवकता में वैसा नहीं है। पीड़ित महिलाएं इससे परेशान हो चुकी हैं। एक पीड़ित महिला का कहना है कि भले ही ये अधिनियम महिलाओं के लिए बनाया गया है पर इससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। महिला का कहना है कि अधिनियम में न्याय की अवधि 6 माह बताई गई है जबकि उन्हें कोर्ट में केस लगाने में ही 6 माह लग गए। वह एक साल से कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं।

    यानि इस अधिनियम से महिलाओं को कब न्याय मिलेगा और मिलेगा भी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। कुछ महिलाएं अधिनियम की इन कमियों की वजह से तो कुछ धन और जानकारी के अभाव में इसका प्रयोग नहीं कर पाती हैं।

    होने चाहिए ये संशोधन

    यह अधिनियम बनाया तो महिलाओं के लिए गया है पर इसमें कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनका प्रयोग बचाव पक्ष वाले कर लेते हैं और उन्हें रियायत मिल जाती है। ऐसे में अधिनियम में कुछ संशोधन होने आवश्यक हैं। जैसे-

    1. न्याय जल्दी दिलाने की बजाय इसमें प्रयास शब्द का बहुत इस्तेमाल किया जाता है जिसके कारण दो माह की बजाय पेशी बढ़ती जाती है।

    2. इसमें संशोधन करके महिलाओं के संरक्षण का कानून भी पारित होना चाहिए।

    3. इस तरह की शिकायतों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जाना चाहिए।

    4. महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।

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